Thursday, October 29

कभी मानस से विलुप्त हो गए थे एक सींग वाले गैंडे, अब नई पीढ़ी के जन्म से संरक्षण अभियान को मिली नई उम्मीद

असम के मानस राष्ट्रीय उद्यान में पुनर्वास के प्रयास सफल होने के संकेत, एक दशक में दर्ज हुए 35 गैंडों के जन्म; आनुवंशिक विविधता और सुरक्षा अब भी बड़ी चुनौती

(SDNA) असम। वन्यजीव संरक्षण की दिशा में असम के मानस राष्ट्रीय उद्यान से उत्साहजनक खबर सामने आई है। कभी इस जंगल से पूरी तरह गायब हो चुके एक सींग वाले गैंडे अब दोबारा अपनी आबादी बढ़ा रहे हैं। दूसरे संरक्षित क्षेत्रों से गैंडों को लाने और पुनर्वास के बाद उन्हें प्राकृतिक आवास में छोड़ने की पहल के सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं। एक अध्ययन के अनुसार, वर्ष 2012 से 2021 के बीच मानस में 35 गैंडों के जन्म दर्ज किए गए। इनमें मानस में जन्मी पहली पीढ़ी के गैंडों के बच्चे भी शामिल हैं, जो इस संरक्षण अभियान की सफलता का महत्वपूर्ण संकेत है।

दूसरे जंगलों से लाकर फिर बसाई गई गैंडों की आबादी

असम के चिरांग और बक्सा जिलों में फैला मानस राष्ट्रीय उद्यान उत्तर में भूटान के रॉयल मानस राष्ट्रीय उद्यान से सटा हुआ है। यहां गैंडों की आबादी को दोबारा स्थापित करने के लिए ‘इंडियन राइनो विजन 2020’ सहित विभिन्न संरक्षण कार्यक्रमों के तहत प्रयास किए गए।

वर्ष 2008 से 2021 के बीच काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान और पोबितोरा वन्यजीव अभयारण्य से 22 एक सींग वाले गैंडों को मानस में स्थानांतरित किया गया। इसके अतिरिक्त, वर्ष 2006 से 2021 के दौरान वन्यजीव पुनर्वास केंद्र से 20 गैंडों को यहां के प्राकृतिक वातावरण में छोड़ा गया।

📢 SD News Agency से जुड़ें और पाएं हर खबर का अपडेट अपने मोबाइल पर!

देश-दुनिया, राजनीति, समाज, व्यापार, प्रदेश और स्थानीय समाचारों की ताजा एवं महत्वपूर्ण खबरें सीधे अपने मोबाइल WhatsApp पर प्राप्त करते रहें।

📰 SD News Agency के WhatsApp ग्रुप से जुड़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें और ग्रुप से जुड़ जाएं।

👉 WhatsApp Group से जुड़ने के लिए क्लिक करें:
SD News Agency WhatsApp Group से जुड़ें

SD News Agency — खबर वही, जो आपके लिए जरूरी है।

इन प्रयासों का उद्देश्य गैंडों को सुरक्षित प्राकृतिक आवास उपलब्ध कराना और मानस में उनकी स्थायी आबादी विकसित करना था। हालिया अध्ययन बताता है कि स्थानांतरित और पुनर्वासित गैंडे यहां के वातावरण के अनुरूप ढल रहे हैं तथा प्रजनन भी कर रहे हैं।

दस वर्षों में 35 बछड़ों का जन्म, पहली पीढ़ी ने भी बढ़ाई उम्मीद

अध्ययन के दौरान दर्ज 35 जन्मों में से 19 बछड़े दूसरे संरक्षित क्षेत्रों से लाई गई मादा गैंडों से पैदा हुए, जबकि नौ बछड़ों का जन्म पुनर्वासित मादाओं से हुआ। मानस में जन्मी पहली पीढ़ी की मादाओं से पांच बछड़े पैदा हुए। दो अन्य बछड़ों की माताओं की पहचान नहीं हो सकी।

वन्यजीव जीवविज्ञानी और आईयूसीएन के एशियन राइनो स्पेशलिस्ट ग्रुप के सदस्य देबा कुमार दत्ता के अनुसार, प्रजनन और बच्चों का जन्म इस बात के महत्वपूर्ण प्रमाण हैं कि पुनर्स्थापित गैंडे नए वातावरण में अनुकूलन कर रहे हैं।

अध्ययन में यह भी सामने आया कि मानस में जन्मी पहली पीढ़ी की मादाओं ने औसतन 5.65 वर्ष की उम्र में पहली बार बच्चे को जन्म दिया, जबकि पुनर्वासित गैंडों में यह उम्र औसतन 9.2 वर्ष रही।

एक सींग वाले गैंडों का प्रजनन चक्र अपेक्षाकृत धीमा होता है। मादाएं सामान्यतः पांच से सात वर्ष की उम्र में प्रजनन के योग्य होती हैं। उनका गर्भकाल लगभग 15 से 16 महीने का होता है और आमतौर पर वे एक बार में एक ही बछड़े को जन्म देती हैं। दो जन्मों के बीच प्रायः दो से तीन वर्ष का अंतर रहता है।

मानसून में अधिक जन्म, भोजन और पानी की उपलब्धता अहम

अध्ययन में गैंडों के प्रजनन का मौसमी स्वरूप भी सामने आया। दर्ज 35 जन्मों में से 14 मई से सितंबर के बीच मानसून के मौसम में हुए। इस दौरान भोजन और पानी की उपलब्धता बढ़ जाती है, जिसका गैंडों की गतिविधियों और उनके आवास के उपयोग पर प्रभाव पड़ सकता है।

वर्षवार आंकड़ों में जन्म दर में उतार-चढ़ाव भी दिखाई दिया। वर्ष 2013 में नौ बछड़ों का जन्म दर्ज किया गया, जबकि 2016 में एक भी जन्म दर्ज नहीं हुआ। इसके बाद स्थिति में सुधार हुआ और 2020 में पांच तथा 2021 में सात बछड़ों के जन्म की जानकारी सामने आई।

शोधकर्ताओं ने रेडियो टेलीमेट्री, वीएचएफ कॉलर, कैमरा ट्रैप और क्षेत्रीय निरीक्षण के माध्यम से गैंडों की गतिविधियों पर नजर रखी। मादा गैंडों और उनके बच्चों की निगरानी से प्रजनन संबंधी महत्वपूर्ण जानकारियां जुटाई गईं।

अलग-अलग समूहों के रहने के तौर-तरीकों में अंतर

अध्ययन से पता चला कि गैंडों के रहने और घूमने का दायरा उनके मूल तथा पुनर्वास के अनुभव के अनुसार अलग-अलग था।

दूसरे संरक्षित क्षेत्रों से लाए गए गैंडों का औसत आवासीय दायरा लगभग 339 वर्ग किलोमीटर पाया गया। इसके विपरीत, पुनर्वासित गैंडों का औसत दायरा लगभग 52 वर्ग किलोमीटर था। मानस में जन्मी पहली पीढ़ी के गैंडों का औसत आवासीय दायरा लगभग 79 वर्ग किलोमीटर दर्ज किया गया।

शोधकर्ताओं के अनुसार, पुनर्वास केंद्रों में पले गैंडों में कभी-कभी मानव बस्तियों के आसपास जाने की प्रवृत्ति देखी जाती है। वहीं, प्राकृतिक जंगलों से पकड़कर स्थानांतरित किए गए गैंडे अक्सर अधिक स्वाभाविक व्यवहार प्रदर्शित करते हैं।

कुछ पहली पीढ़ी की मादाओं को उन स्थानों पर बच्चों को जन्म देते हुए देखा गया, जिनका उपयोग उनकी माताएं भी करती थीं। इससे संकेत मिलता है कि गैंडों में आवास के उपयोग से जुड़े व्यवहार अगली पीढ़ी में भी बने रह सकते हैं।

अवैध शिकार और अंतर्प्रजनन से आबादी को खतरा

गैंडों की संख्या में बढ़ोतरी के बावजूद संरक्षण की चुनौतियां समाप्त नहीं हुई हैं। अध्ययन के शुरुआती वर्षों में अवैध शिकार के कारण कई वयस्क नर गैंडों की मौत हुई थी। इससे प्रजनन के अवसर प्रभावित हुए और आबादी में नर-मादा के अनुपात पर भी असर पड़ा।

इसके अतिरिक्त, छोटी आबादी में करीबी रिश्ते वाले जीवों के बीच प्रजनन यानी अंतर्प्रजनन (इनब्रीडिंग) का खतरा बना रहता है। इससे आनुवंशिक विविधता कम हो सकती है और भविष्य में आबादी की अनुकूलन क्षमता प्रभावित होने की आशंका रहती है।

वन्यजीव विशेषज्ञ यादवेंद्रदेव झाला का मानना है कि गैंडों का जीवन चक्र धीमा होने के कारण उनकी आबादी को फिर से मजबूत करने के लिए लंबे समय तक निरंतर संरक्षण जरूरी है। उनके अनुसार, मानस के गैंडों का प्रबंधन काजीरंगा, पोबितोरा और पश्चिम बंगाल के अन्य गैंडा क्षेत्रों की आबादी के साथ समन्वय बनाकर किया जाना चाहिए। इससे विभिन्न समूहों के बीच आनुवंशिक विविधता बनाए रखने में मदद मिल सकती है।

संरक्षण की निरंतरता ही स्थायी सफलता की कुंजी

विशेषज्ञों ने मानस में गैंडों की आबादी को और मजबूत करने के लिए अन्य संरक्षित क्षेत्रों से अतिरिक्त गैंडों को लाने, नियमित निगरानी और प्राकृतिक आवास के बेहतर प्रबंधन पर जोर दिया है। घास के मैदानों से आक्रामक पौधों को हटाना और पूरे वर्ष पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करना भी महत्वपूर्ण उपाय हैं।

मानस राष्ट्रीय उद्यान में गैंडों की नई पीढ़ी का जन्म संरक्षण प्रयासों के लिए सकारात्मक उपलब्धि है। हालांकि, इस सफलता को स्थायी बनाने के लिए अवैध शिकार पर प्रभावी नियंत्रण, पर्याप्त प्राकृतिक आवास और आनुवंशिक विविधता का संरक्षण अनिवार्य होगा। यह उदाहरण बताता है कि उचित योजना, वैज्ञानिक निगरानी और दीर्घकालिक प्रतिबद्धता से विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुकी वन्यजीव आबादी को फिर से जीवन दिया जा सकता है।