Thursday, October 29

गोवा में रियल एस्टेट का बढ़ता दायरा, खेतों-बागों और पहाड़ियों के अस्तित्व पर मंडराया संकट

भूमि उपयोग बदलने के प्रावधान के खिलाफ सड़कों पर उतरे नागरिक; धारा 39(ए) को निरस्त करने की मांग, सतत विकास और पर्यावरण संरक्षण पर उठे गंभीर सवाल

(SDNA) गोवा। देश के प्रमुख पर्यटन स्थलों में शामिल गोवा में रियल एस्टेट का तेजी से विस्तार अब कृषि भूमि, पारंपरिक बाग-बगीचों और प्राकृतिक पहाड़ियों के संरक्षण को लेकर बड़ी बहस का विषय बन गया है। राज्य के शहर एवं ग्रामीण नियोजन अधिनियम में शामिल धारा 39(ए) के तहत संरक्षित भूमि को आवासीय क्षेत्र में बदलने की अनुमति दिए जाने के विरोध में नागरिकों का आंदोलन तेज हो गया है। प्रदर्शनकारी इसे गोवा की प्राकृतिक विरासत, खेती-किसानी और भविष्य की पर्यावरणीय सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती मान रहे हैं।

आंदोलनकारियों की मांग है कि इस प्रावधान को पूरे राज्य में पूरी तरह समाप्त किया जाए और कृषि एवं पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील भूमि को गैर-कृषि उपयोग में बदलने पर प्रभावी रोक लगाने के लिए कठोर कानून बनाया जाए। उनका आरोप है कि भूमि उपयोग में बदलाव की प्रक्रिया रियल एस्टेट परियोजनाओं के विस्तार का रास्ता आसान कर रही है, जबकि स्थानीय समुदायों की आपत्तियों और पर्यावरणीय चिंताओं को पर्याप्त महत्व नहीं मिल रहा है।

सिरिदाओ की पहाड़ी बनी विवाद का केंद्र

गोवा के सिरिदाओ गांव में तुषार गवास के घर के पीछे स्थित एक हरा-भरा बाग इस विवाद का प्रमुख उदाहरण बनकर सामने आया है। यहां मिर्च, काजू और कई प्रकार के औषधीय पौधे उगाए जाते हैं। जिस पहाड़ी को पहले अत्यधिक ढलान और निर्माण के लिहाज से असुरक्षित माना जाता था, उसी भूमि को 26 जनवरी को आवासीय क्षेत्र के रूप में पुनर्वर्गीकृत कर दिया गया। इससे वहां भविष्य में निर्माण गतिविधियों का रास्ता खुल गया।

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गवास ने इस निर्णय पर आपत्ति दर्ज कराई, लेकिन उनकी आपत्ति को पर्याप्त विवरण नहीं होने के आधार पर खारिज कर दिया गया। इसके बाद उन्होंने 18 अन्य स्थानीय निवासियों के साथ फरवरी 2026 में संबंधित विभाग को विस्तृत पत्र भेजा। पत्र के साथ ऐतिहासिक नक्शे और सर्वेक्षण संबंधी दस्तावेज भी संलग्न किए गए, जिनमें सर्वे ऑफ इंडिया के स्थलाकृतिक नक्शे शामिल थे। इन नक्शों के अनुसार संबंधित भूमि की ढलान 25 प्रतिशत से अधिक थी, जबकि राज्य की क्षेत्रीय योजना में ऐसी ढलानों पर पहाड़ी काटने और निर्माण करने पर प्रतिबंध है।

विवाद तब और गहरा गया, जब भूमि के मालिक डेंपो प्रॉपर्टीज एंड इन्वेस्टमेंट्स द्वारा नियुक्त निजी इंजीनियरिंग कंपनी एल्कॉन के सर्वेक्षण में ढलान 25 प्रतिशत से कम बताई गई। इसी निष्कर्ष के आधार पर भूमि के पुनर्वर्गीकरण के अनुरोध को आंशिक स्वीकृति मिली। स्थानीय कार्यकर्ताओं ने सवाल उठाया कि सरकारी एजेंसियों के नक्शों और निजी सर्वेक्षण के निष्कर्षों में अंतर होने के बावजूद स्वतंत्र सत्यापन क्यों नहीं कराया गया।

9.5 लाख वर्ग मीटर से अधिक भूमि आवासीय क्षेत्र में शामिल

धारा 39(ए) के अंतर्गत अब तक गोवा में 9.5 लाख वर्ग मीटर से अधिक भूमि को आवासीय क्षेत्र में बदला जा चुका है। इनमें कृषि भूमि, बाग-बगीचों और पहाड़ी क्षेत्रों के ऐसे हिस्से भी शामिल हैं, जिन्हें पहले निर्माण के लिए प्रतिबंधित या संवेदनशील माना जाता था।

इस प्रावधान के तहत व्यक्ति और कंपनियां निर्धारित शुल्क देकर राज्य की क्षेत्रीय योजना में दर्ज भूमि उपयोग से अलग वर्गीकरण की मांग कर सकते हैं। शहर एवं ग्रामीण नियोजन बोर्ड आवेदन की समीक्षा करता है। प्रारंभिक स्वीकृति के बाद राजपत्र अधिसूचना के जरिए 30 दिनों तक आम जनता से आपत्तियां और सुझाव आमंत्रित किए जाते हैं। इसके बाद प्राप्त आपत्तियों पर विचार कर अंतिम निर्णय लिया जाता है।

हालांकि, आंदोलनकारियों और शहरी नियोजन से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि व्यवहार में इस प्रक्रिया के दौरान आम लोगों की चिंताओं को प्रभावी ढंग से सुनने में कठिनाइयां आती हैं। वास्तुकार एवं शहरी योजनाकार ताहिर नोरोन्हा के अनुसार, कई बार ग्रामीण लंबी दूरी तय कर आपत्तियां दर्ज कराने पहुंचते हैं, लेकिन उन्हें यह कहकर जवाब दे दिया जाता है कि उनकी आपत्तियों में पर्याप्त विवरण नहीं है।

‘इनफ इज इनफ’ आंदोलन ने बढ़ाया दबाव

धारा 39(ए) के खिलाफ ‘इनफ इज इनफ’ यानी ‘अब और नहीं’ अभियान के तहत नागरिकों ने व्यापक विरोध प्रदर्शन शुरू किए हैं। आंदोलनकारियों का कहना है कि केवल कुछ निर्वाचन क्षेत्रों में भूमि पुनर्वर्गीकरण पर रोक लगाने या मौखिक आश्वासन देने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं होगा।

गोवा रिवोल्यूशनरीज पार्टी के विधायक वीरेश बोरकर ने इस प्रावधान को पूरी तरह वापस लेने की मांग करते हुए 21 से 26 फरवरी तक भूख हड़ताल की। 23 फरवरी को सैकड़ों प्रदर्शनकारी शहर एवं ग्रामीण नियोजन मंत्री विश्वजीत राणे के आवास के बाहर एकत्र हुए। इसके बाद 26 फरवरी को सरकार बोरकर के सेंट आंद्रे निर्वाचन क्षेत्र में धारा 39(ए) के इस्तेमाल को निलंबित करने पर सहमत हुई।

25 मार्च को मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत ने भी अपने विधानसभा क्षेत्र सांकेलिम में इस प्रावधान के तहत पुनर्वर्गीकरण के लिए अधिसूचित भूमि पर रोक लगाने की घोषणा की। हालांकि, प्रदर्शनकारी इन कदमों को सीमित और अस्थायी मानते हैं। उनकी मांग है कि प्रतिबंध पूरे गोवा में लागू हो और संबंधित कानूनी प्रावधान को ही समाप्त किया जाए।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति फेर्डिनेंडो रेबेलो ने कृषि भूमि की रक्षा के लिए व्यापक भूमि संरक्षण कानून बनाने का सुझाव दिया है। वहीं, बॉम्बे उच्च न्यायालय की वरिष्ठ अधिवक्ता नोर्पा अल्वारिस ने क्षेत्रीय स्तर पर घोषित निलंबनों की कानूनी स्थिति पर सवाल उठाए हैं। उनके अनुसार, भूमि उपयोग की योजना विशेषज्ञों और व्यापक जनहित को ध्यान में रखकर बनाई जानी चाहिए, न कि भूखंड मालिकों की व्यक्तिगत पसंद के आधार पर।

दूसरे घरों की मांग से गर्म हुआ संपत्ति बाजार

गोवा में रियल एस्टेट की बढ़ती मांग के पीछे दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु जैसे महानगरों से आने वाले खरीदारों की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। कई लोग राज्य में छुट्टियां बिताने के लिए दूसरा घर खरीदना चाहते हैं। इसके चलते लग्जरी अपार्टमेंट, गेटेड कम्युनिटी और हॉलिडे होम जैसी परियोजनाओं की मांग बढ़ी है।

रियल एस्टेट कंसल्टेंसी फर्म सैविल्स इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, धारा 39(ए) के तहत भूमि के वर्गीकरण में बदलाव के लिए सरकार को 1,346 से अधिक आवेदन प्राप्त हुए हैं।

वरिष्ठ पत्रकार संदेश प्रभुदेसाई का तर्क है कि आवासीय परियोजनाओं के नाम पर विकसित होने वाली कई संपत्तियों का इस्तेमाल अंततः पर्यटकों के ठहरने के लिए किया जा सकता है। उनके अनुसार, इन परियोजनाओं को स्थानीय लोगों की आवासीय जरूरतों से जोड़कर देखना पर्याप्त नहीं है, क्योंकि इनका प्रचार भी कई बार लग्जरी स्टे और हॉलिडे होम के रूप में किया जाता है।

गोवा में पर्यटन से जुड़े आवासों के नियमन पर भी सवाल उठते रहे हैं। वर्ष 2020 की केपीएमजी रिपोर्ट का हवाला देते हुए प्रभुदेसाई ने कहा कि राज्य में पर्यटकों को ठहराने वाले कई होटल, फ्लैट और वेकेशन होम पर्यटन विभाग में पंजीकृत नहीं थे। ऐसे में रियल एस्टेट के विस्तार और पर्यटन गतिविधियों के बीच संबंधों की प्रभावी निगरानी भी जरूरी हो जाती है।

बेतरतीब शहरीकरण से जल-संसाधनों पर असर

गोवा में भूमि उपयोग में बदलाव का असर केवल खेती या प्राकृतिक सुंदरता तक सीमित नहीं है। इससे जल संचयन, वर्षा जल के बहाव और स्थानीय पारिस्थितिकी पर भी प्रभाव पड़ने की आशंका है।

भारतीय विज्ञान संस्थान के शोधकर्ताओं के अध्ययन के अनुसार, 1973 से 2022 के बीच गोवा का निर्मित क्षेत्र 22.2 वर्ग किलोमीटर से बढ़कर 180.94 वर्ग किलोमीटर हो गया। यानी इस अवधि में निर्मित क्षेत्र लगभग आठ गुना विस्तृत हुआ।

अध्ययन में बिखरे हुए शहरी विकास और देशी वनस्पतियों के आवरण में गिरावट को स्थानीय जलवैज्ञानिक प्रक्रियाओं में बदलाव से जोड़ा गया है। वनस्पति और प्राकृतिक भूमि कम होने से वर्षा का पानी तेजी से बह सकता है, जबकि जमीन में पानी के समावेशन और संचयन की क्षमता प्रभावित हो सकती है।

इसी कारण कई ग्राम पंचायतों ने मांग की है कि भूमि के बड़े पैमाने पर पुनर्वर्गीकरण से पहले वहन क्षमता का अध्ययन कराया जाए। इससे यह आकलन किया जा सकेगा कि संबंधित क्षेत्र अतिरिक्त आबादी, इमारतों और बुनियादी ढांचे का भार उठा सकते हैं या नहीं।

सरकार का पक्ष: क्षेत्रीय योजना में सुधार की जरूरत

गोवा सरकार धारा 39(ए) को क्षेत्रीय योजना में मौजूद गलतियों को सुधारने का माध्यम बताती रही है। शहर एवं ग्रामीण नियोजन मंत्री विश्वजीत राणे ने विधानसभा में कहा था कि क्षेत्रीय योजना के केवल 0.2 प्रतिशत हिस्से में बदलाव किया गया है। उन्होंने यह भी कहा कि प्रारंभिक स्वीकृति को अंतिम अनुमति नहीं माना जाना चाहिए और जांच समिति यह सुनिश्चित करेगी कि अंतिम निर्णय से पहले कानूनी प्रावधानों का पालन हो।

हालांकि, विपक्षी विधायकों द्वारा इस मुद्दे पर चर्चा की मांग के बावजूद विधानसभा सत्र 16 मार्च को स्थगित हो गया और इस विषय पर विस्तृत चर्चा नहीं हो सकी। आंदोलनकारियों का आरोप है कि इतने महत्वपूर्ण विषय पर सार्वजनिक विमर्श और जवाबदेही सुनिश्चित की जानी चाहिए थी।

भूमि उपयोग में बदलाव को लेकर मंत्री और रियल एस्टेट कारोबार के संभावित हितों के बीच संबंधों पर भी बहस हो रही है। रिपोर्ट के अनुसार, रियल एस्टेट फर्म करापुर एस्टेट्स में विश्वजीत राणे का नाम निदेशक के रूप में सूचीबद्ध है। इस फर्म ने पहले बिचोलिम गांव में भूमि का वर्गीकरण बदलने के लिए आवेदन किया था। प्रभुदेसाई ने अपने लेख में ऐसे 30 पूर्व और मौजूदा विधायकों का उल्लेख किया था, जिन्होंने धारा 39(ए) या उससे पहले के प्रावधानों के तहत भूमि पुनर्वर्गीकरण के लिए आवेदन किए थे। ये आरोप भूमि नियोजन में हितों के टकराव और पारदर्शिता को लेकर सवाल खड़े करते हैं।

भूमि परिवर्तन से जुड़े पुराने विवाद

गोवा देश का पहला राज्य बना था जिसने 1986 में क्षेत्रीय योजना तैयार की। इसका उद्देश्य भविष्य के विकास की दिशा निर्धारित करते हुए आवासीय क्षेत्रों, आर्थिक गतिविधियों, कृषि भूमि, बाग-बगीचों और विकास-निषेध क्षेत्रों को स्पष्ट रूप से चिह्नित करना था। वर्तमान क्षेत्रीय योजना 2021 के तहत राज्य की कुल भूमि का लगभग 22 प्रतिशत हिस्सा आवासीय बस्तियों के लिए निर्धारित किया गया है।

भूमि नियोजन को लेकर राज्य में पहले भी विवाद हो चुके हैं। वर्ष 2011 की क्षेत्रीय योजना में आवासीय उपयोग के लिए जरूरत से अधिक भूमि निर्धारित किए जाने के आरोपों के बाद व्यापक विरोध हुआ और योजना को रद्द करना पड़ा। इसके बाद क्षेत्रीय योजना 2021 तैयार करते समय ग्राम पंचायत स्तर पर नक्शों और सर्वेक्षणों पर चर्चा के माध्यम से जनता की भागीदारी बढ़ाने का प्रयास किया गया।

लेकिन इसके बाद भी क्षेत्रीय योजना में बदलाव की अनुमति देने वाले कई कानूनी प्रावधान सामने आए।

वर्ष 2018 में शहर एवं ग्रामीण नियोजन अधिनियम में धारा 16(बी) जोड़ी गई, जिसके तहत भूमि मालिकों को विशेष भूखंडों के क्षेत्रीय वर्गीकरण में बदलाव के लिए आवेदन करने की अनुमति मिली। बॉम्बे उच्च न्यायालय ने जनहित याचिकाओं के बाद इस प्रावधान पर रोक लगा दी थी।

वर्ष 2022 में धारा 17(2) के जरिए क्षेत्रीय योजना में कथित गलतियों को सुधारने के नाम पर भूमि के वर्गीकरण में बदलाव का एक और रास्ता उपलब्ध कराया गया। मार्च 2025 में बॉम्बे उच्च न्यायालय ने इस प्रावधान के तहत कार्यपालिका को मिलने वाले अधिकारों को सीमित करते हुए कहा कि इससे भूमि उपयोग में बदलाव के लिए अनियंत्रित और मनमाने अधिकार दिए जाने की समस्या पैदा हो सकती है। राज्य सरकार ने इस फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी है।

अदालत के हस्तक्षेप से पहले धारा 17(2) के तहत लगभग 25 लाख वर्ग मीटर भूमि का रूपांतरण किए जाने की जानकारी सामने आई थी। वर्ष 2024 में धारा 39(ए) को एक नए प्रावधान के रूप में लाया गया। आलोचकों का कहना है कि नए प्रावधान में आपत्तियां दर्ज कराने के लिए 30 दिन की अवधि का प्रावधान होने के बावजूद, भूमि उपयोग संबंधी फैसलों में आम जनता की भागीदारी पर्याप्त नहीं है।

पारंपरिक भूमि अधिकारों और कृषि व्यवस्था पर भी सवाल

गोवा की विशिष्ट भूमि स्वामित्व व्यवस्था के कारण भूमि पुनर्वर्गीकरण का विवाद और जटिल हो जाता है। राज्य के कुछ गांवों में सामुदायिक तथा कृषि भूमि का प्रबंधन ‘कम्युनिडाडे’ संस्थाओं के माध्यम से होता है। इन संस्थाओं की ऐतिहासिक जड़ें पुर्तगाली शासन के दौर तक जाती हैं और पारंपरिक रूप से इनकी भूमि खेती के लिए पट्टे पर दी जाती रही है।

भूमि अधिकारों से जुड़े विवादों के बीच कुछ भूस्वामियों द्वारा किरायेदारों के साथ ऐसी घोषणाएं किए जाने की बात सामने आई है, जिनके माध्यम से किरायेदार निर्धारित भुगतान के बदले भूमि पर अपने अधिकारों से संबंधित दावे छोड़ने के दस्तावेजों पर सहमत हो जाते हैं। आलोचकों के अनुसार, इससे डेवलपर्स के लिए जमीन बेचना या उसका उपयोग बदलना आसान हो सकता है।

पारसेम गांव के पूर्व सरपंच अजय कोलंगुटकर ने कहा कि पारंपरिक भूमि का चुपचाप पुनर्वर्गीकरण और उसके बाद डेवलपर्स को बेचा जाना स्थानीय लोगों में असंतोष पैदा कर रहा है। उनके अनुसार, ग्रामीण अपनी पारंपरिक जमीनों की कीमत पर पर्यटन और निर्माण गतिविधियों का अनियंत्रित विस्तार नहीं चाहते।

न्यायमूर्ति फेर्डिनेंडो रेबेलो ने एकीकृत भूमि संरक्षण विधेयक का प्रस्ताव रखा है। इसका उद्देश्य कृषि भूमि की परिभाषा को व्यापक बनाना, खेती के अलावा अन्य उपयोगों पर रोक लगाना तथा कृषि भूमि की बिक्री और हस्तांतरण को नियंत्रित करना है। प्रस्ताव में ऐसी भूमि के हस्तांतरण को किसानों या कम से कम 30 वर्षों से गोवा में रह रहे लोगों तक सीमित रखने का सुझाव भी शामिल है।

रेबेलो के अनुसार, भूमि संरक्षण के लिए ऐसे प्रावधान जरूरी हैं जो सतत विकास, एहतियाती सिद्धांत, प्रदूषण फैलाने वाले से उसकी लागत वसूलने और भावी पीढ़ियों के हितों जैसे सिद्धांतों के अनुरूप हों।

विकास और संरक्षण के बीच संतुलन की चुनौती

बिट्स पिलानी, गोवा के सहायक प्रोफेसर सोलानो दा सिल्वा का मानना है कि राज्य की क्षेत्रीय योजना में सुधार की जरूरत से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन बदलाव वैज्ञानिक आंकड़ों और पर्यावरणीय आवश्यकताओं के आधार पर होने चाहिए। उन्होंने भूमि अभिलेखों और नक्शों में खजान भूमि, पट्टे पर दी गई जमीनों तथा वन क्षेत्रों से संबंधित कमियों की ओर भी ध्यान दिलाया।

उनके अनुसार, कृषि, पर्यावरण और जलवायु से संबंधित विभागों द्वारा तैयार की गई रिपोर्टें, मृदा क्षरण एटलस और आर्द्रभूमि मानचित्र भविष्य की भूमि नियोजन प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाने में सहायक हो सकते हैं।

गोवा के सामने अब मूल प्रश्न यह है कि क्या रियल एस्टेट और पर्यटन की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए कृषि भूमि, पहाड़ियों और प्राकृतिक संसाधनों पर लगातार दबाव बढ़ाया जाएगा, या विकास की ऐसी नीति अपनाई जाएगी जिसमें स्थानीय निवासियों के अधिकार, पर्यावरणीय सुरक्षा और भविष्य की पीढ़ियों की जरूरतों को समान महत्व मिले।

धारा 39(ए) के विरोध में चल रहा आंदोलन इसी व्यापक बहस का प्रतीक बन गया है। प्रदर्शनकारियों की मांग है कि भूमि उपयोग में बदलाव केवल राजस्व या निर्माण की संभावनाओं के आधार पर नहीं, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन, कृषि सुरक्षा, स्थानीय समुदायों की भागीदारी और दीर्घकालिक सार्वजनिक हित को केंद्र में रखकर किया जाए।