Thursday, October 29

VEDIO: दिल्ली में धारा 163 के नाम पर यातायात रोकने पर पुलिस से भिड़े अधिवक्ता प्रताप भानु, आदेश की प्रति मांगने वाला वीडियो वायरल

“जब रोकने का आदेश है, तो उसकी कॉपी दिखाइए” — कानून के पालन और जवाबदेही को लेकर सोशल मीडिया पर छिड़ी चर्चा

नई दिल्ली | SDNA

दिल्ली में 10 अक्टूबर को धारा 163 का हवाला देकर छावनी क्षेत्र में आवाजाही और यातायात प्रभावित किए जाने को लेकर पुलिस और एक अधिवक्ता के बीच हुई बहस का वीडियो इन दिनों सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। वीडियो में एससी अधिवक्ता प्रताप भानु पुलिस अधिकारियों से कथित प्रतिबंधात्मक आदेश की प्रति दिखाने की मांग करते नजर आ रहे हैं। इस घटनाक्रम ने कानून के पालन, प्रशासनिक कार्रवाई और नागरिकों के अधिकारों को लेकर नई चर्चा छेड़ दी है।

वायरल वीडियो में अधिवक्ता प्रताप भानु पुलिसकर्मियों से सवाल करते दिखाई देते हैं कि यदि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 के तहत यातायात रोकने या आवाजाही प्रतिबंधित करने का आदेश जारी किया गया है, तो उसकी प्रति उन्हें दिखाई जाए। उनका तर्क है कि किसी प्रतिबंधात्मक आदेश के आधार पर कार्रवाई की जा रही है, तो संबंधित आदेश का होना और उसके आधार पर कार्रवाई की वैधता स्पष्ट होना आवश्यक है।

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वीडियो में अधिवक्ता पुलिस से कहते नजर आते हैं कि वे केवल आदेश की प्रति मांग रहे हैं और कानून के दायरे में रहकर अपनी बात रख रहे हैं। वे यह भी सवाल उठाते दिखाई देते हैं कि यदि मौके पर आदेश की प्रति उपलब्ध नहीं है, तो लोगों की आवाजाही रोकने का आधार क्या है।

पुलिस का जवाब, लेकिन बहस का नहीं निकला स्पष्ट निष्कर्ष

वीडियो में संबंधित पुलिस अधिकारी आदेश की प्रति होने की बात कहते नजर आते हैं, लेकिन अधिवक्ता को उसे दिखाने को लेकर संवाद आगे बढ़ता दिखाई देता है। इसके बाद अधिवक्ता कथित तौर पर कहते हैं कि यदि आदेश की प्रति मौके पर उपलब्ध नहीं कराई जा सकती, तो वे संबंधित उच्चाधिकारी से उसकी प्रति प्राप्त कर मामले को समझेंगे।

हालांकि, सोशल मीडिया पर प्रसारित वीडियो के आधार पर यह स्वतंत्र रूप से स्पष्ट नहीं होता कि संबंधित आदेश वास्तव में जारी हुआ था या नहीं, उसकी शर्तें क्या थीं और मौके पर उसे उपलब्ध कराने के संबंध में क्या प्रक्रिया निर्धारित थी। इस संबंध में पुलिस का आधिकारिक पक्ष तथा आदेश की प्रमाणित प्रति सामने आना महत्वपूर्ण होगा।

धारा 163 क्या कहती है?

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 163 का संबंध तात्कालिक मामलों में उपद्रव या संभावित खतरे को रोकने के लिए आदेश जारी करने की शक्तियों से है। परिस्थितियों के अनुसार सक्षम कार्यपालक मजिस्ट्रेट या कानून में निर्दिष्ट अधिकारी इस प्रावधान के तहत प्रतिबंधात्मक आदेश जारी कर सकते हैं।

हालांकि, धारा 163 का हवाला देना अपने आप में किसी भी प्रकार की रोक को वैध साबित नहीं करता। कार्रवाई की वैधता संबंधित आदेश, उसे जारी करने वाले सक्षम अधिकारी, लागू परिस्थितियों और आदेश की वास्तविक शर्तों पर निर्भर करती है। इसलिए किसी विशेष मामले में निष्कर्ष निकालने से पहले आदेश और संबंधित तथ्यों की जांच जरूरी है।

वायरल वीडियो ने उठाया जवाबदेही का सवाल

इस वीडियो को लेकर सोशल मीडिया पर चर्चा का प्रमुख विषय यह है कि कानून लागू करने वाली एजेंसियों से कानूनी कार्रवाई का आधार पूछना और उसके बारे में स्पष्ट जानकारी मांगना कितना महत्वपूर्ण है। एक ओर प्रशासन को कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए निर्धारित शक्तियों का इस्तेमाल करना होता है, वहीं दूसरी ओर नागरिकों को भी यह जानने का अधिकार है कि उन पर प्रतिबंध किस कानूनी आधार पर लगाया जा रहा है।

इस घटनाक्रम को केवल पुलिस और अधिवक्ता के बीच हुई बहस के रूप में देखने के बजाय कानून की जानकारी, प्रशासनिक पारदर्शिता और नागरिक जागरूकता के संदर्भ में भी देखा जा रहा है।

SDNA का दृष्टिकोण: कानून का सम्मान और उसका पारदर्शी क्रियान्वयन, दोनों लोकतांत्रिक व्यवस्था के महत्वपूर्ण आधार हैं। यदि किसी आदेश के तहत यातायात या आवाजाही पर रोक लगाई जाती है, तो उसके कानूनी आधार और लागू शर्तों की स्पष्ट जानकारी उपलब्ध होना जनता का प्रशासन पर विश्वास मजबूत कर सकता है। वहीं, किसी वायरल वीडियो के आधार पर अंतिम निष्कर्ष निकालने से पहले संबंधित आदेश और प्रशासन का आधिकारिक पक्ष सामने आना भी उतना ही जरूरी है।

(SDNA) — खबर के पीछे की सच्चाई।