
GCHA की हेल्दी NDC स्कोरकार्ड रिपोर्ट में भारत का प्रदर्शन कमजोर; 32 में से मिले महज 2 अंक, जलवायु परिवर्तन और जनस्वास्थ्य को एक साथ देखने की जरूरत पर जोर
नई दिल्ली। जलवायु परिवर्तन का असर अब केवल बढ़ते तापमान, अनियमित बारिश और प्राकृतिक आपदाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लोगों की सेहत, वायु गुणवत्ता और स्वास्थ्य सेवाओं पर भी गंभीर प्रभाव डाल रहा है। इसी संबंध को ध्यान में रखते हुए जारी हेल्दी NDC स्कोरकार्ड में भारत को 32 में से केवल 2 अंक मिले हैं। रिपोर्ट के अनुसार, देश की जलवायु योजना में स्वास्थ्य और वायु प्रदूषण से जुड़े कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है।
ग्लोबल क्लाइमेट एंड हेल्थ अलायंस (GCHA) ने 14 अक्टूबर 2026 को यह स्कोरकार्ड जारी किया। यह गठबंधन 300 से अधिक स्वास्थ्य पेशेवर संगठनों और स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े नागरिक संगठनों का प्रतिनिधित्व करता है। रिपोर्ट में विभिन्न देशों की जलवायु प्रतिबद्धताओं का आकलन इस आधार पर किया गया है कि वे जलवायु परिवर्तन से निपटने के साथ-साथ लोगों के स्वास्थ्य की सुरक्षा को कितनी प्राथमिकता देते हैं।
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आठ श्रेणियों में हुआ जलवायु योजनाओं का मूल्यांकन
पेरिस जलवायु समझौते के अंतर्गत प्रत्येक देश अपनी राष्ट्रीय जलवायु प्रतिबद्धता यानी NDC (नेशनली डिटरमिन्ड कंट्रीब्यूशन) संयुक्त राष्ट्र के समक्ष प्रस्तुत करता है। इन योजनाओं में उत्सर्जन घटाने और जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर उठाए जाने वाले कदमों का उल्लेख होता है।
स्कोरकार्ड में 1 अगस्त 2026 से पहले अपनी 2035 की जलवायु योजनाएं जमा करने वाले 132 देशों का मूल्यांकन किया गया। इसमें यूरोपीय संघ की साझा योजना भी शामिल है। प्रत्येक देश को आठ श्रेणियों में अधिकतम चार-चार अंक दिए जा सकते थे, जिससे कुल स्कोर 32 निर्धारित किया गया।
मूल्यांकन के प्रमुख आधार थे—स्वास्थ्य पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव, वायु प्रदूषण, स्वास्थ्य क्षेत्र की भूमिका, स्वास्थ्य संबंधी सह-लाभ, न्यायसंगत बदलाव, विभिन्न विभागों के बीच समन्वय, आर्थिक संसाधन एवं वित्त और योजनाओं की निगरानी तथा क्रियान्वयन।
भारत को छह श्रेणियों में नहीं मिला कोई अंक
रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की NDC 24 अप्रैल 2026 को प्रकाशित हुई थी। इसमें स्वास्थ्य क्षेत्र की कार्रवाई और एकीकृत शासन व्यवस्था के लिए एक-एक अंक दिया गया। शेष छह श्रेणियों में भारत को शून्य अंक मिले।
इस प्रदर्शन से जलवायु नीति में स्वास्थ्य प्रभावों के आकलन, प्रदूषण नियंत्रण, स्वच्छ ऊर्जा की ओर न्यायसंगत बदलाव, वित्तीय व्यवस्था और योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन जैसे विषयों पर अधिक ध्यान देने की जरूरत सामने आती है।
भारत के साथ जापान और न्यूजीलैंड को भी दो-दो अंक मिले। GCHA के अनुसार, इतने कम अंक जलवायु परिवर्तन और जनस्वास्थ्य के बीच संबंध को नीतिगत स्तर पर पर्याप्त महत्व नहीं दिए जाने की ओर संकेत करते हैं।
भारत में वायु प्रदूषण से होने वाली मौतें बड़ी चुनौती
रिपोर्ट में भारत में वायु प्रदूषण से होने वाली मौतों के आंकड़ों को भी रेखांकित किया गया है। स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर के अनुसार, भारत में वायु प्रदूषण के कारण प्रति एक लाख आबादी पर 186.2 मौतें दर्ज की जाती हैं।
इसके बावजूद, रिपोर्ट के मुताबिक भारत की राष्ट्रीय जलवायु प्रतिबद्धता में वायु प्रदूषण का स्पष्ट उल्लेख नहीं है। यह स्थिति इस बात पर सवाल खड़े करती है कि जलवायु नीतियों में प्रदूषण से होने वाले स्वास्थ्य नुकसान को कितनी प्राथमिकता दी जा रही है।
क्लाइमेट एक्शन ट्रैकर के आकलन का हवाला देते हुए रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत और जापान के उत्सर्जन कटौती लक्ष्य पेरिस समझौते के अनुरूप नहीं हैं। रिपोर्ट का मानना है कि उत्सर्जन कम करने की अपर्याप्त महत्वाकांक्षा और स्वास्थ्य सुरक्षा की कमजोर व्यवस्था नागरिकों के लिए जोखिम बढ़ा सकती है।
ग्लोबल साउथ के देशों ने दिखाई बेहतर तस्वीर
स्कोरकार्ड में कोलंबिया 29 अंकों के साथ शीर्ष स्थान पर रहा। नाइजीरिया को 25, कंबोडिया को 24 तथा पैराग्वे और तिमोर-लेस्ते को 22-22 अंक मिले। रिपोर्ट के अनुसार, शीर्ष 20 देशों में 19 निम्न और मध्यम आय वाले देश हैं।
GCHA की पॉलिसी लीड जेस बीगली के मुताबिक, इन देशों का बेहतर प्रदर्शन इस वास्तविकता को दर्शाता है कि जलवायु परिवर्तन और स्वास्थ्य को अलग-अलग करके देखना व्यावहारिक नहीं है। विशेष रूप से विकासशील देशों में प्रदूषण, जलवायु संबंधी आपदाओं और स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों का असर सीधे लोगों के जीवन पर पड़ता है।
इसके विपरीत, कई बड़े उत्सर्जक देशों का प्रदर्शन कमजोर रहा। दक्षिण कोरिया को 4, रूस को 6, ब्राजील को 7 तथा ऑस्ट्रेलिया, चीन और ब्रिटेन को 9-9 अंक मिले। रिपोर्ट के अनुसार, इन देशों ने उत्सर्जन में कटौती के लिए अपने उचित हिस्से के अनुरूप पर्याप्त प्रतिबद्धता नहीं दिखाई है।
ब्लैक कार्बन जैसे प्रदूषकों पर कार्रवाई की जरूरत
रिपोर्ट में ब्लैक कार्बन, मीथेन, हाइड्रोफ्लोरोकार्बन (HFC) और ट्रोपोस्फेरिक ओजोन जैसे प्रदूषकों पर तेजी से कार्रवाई करने की आवश्यकता बताई गई है। ये प्रदूषक जलवायु परिवर्तन और वायु प्रदूषण दोनों से जुड़े हैं तथा मानव स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाते हैं।
ब्लैक कार्बन के उत्सर्जन में कटौती का लक्ष्य केवल पांच देशों—कंबोडिया, चिली, कोलंबिया, कोस्टा रिका और पैराग्वे—ने निर्धारित किया है। भारत इस सूची में शामिल नहीं है।
GCHA की रिसर्च लीड डॉ. नोवा टेबे के अनुसार, इन अल्पकालिक जलवायु प्रदूषकों पर कार्रवाई से ग्लोबल वार्मिंग की गति कम करने, स्वास्थ्य में अपेक्षाकृत जल्दी सुधार लाने और आर्थिक बचत करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि दीर्घकालिक तापमान वृद्धि को सीमित करने के लिए कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन में भारी कटौती भी आवश्यक है।
प्रदूषण से आर्थिक नुकसान, लेकिन वित्त की कमी
वायु प्रदूषण का असर केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है। इससे उत्पादकता घटती है, समय से पहले मौतें होती हैं और अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचता है। रिपोर्ट में उद्धृत आकलन के अनुसार, वायु प्रदूषण से जुड़े स्वास्थ्य प्रभावों और उत्पादकता के नुकसान के कारण वैश्विक GDP का लगभग 5 प्रतिशत प्रभावित होता है।
इसके बावजूद, स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर क्वालिटी फंडिंग रिपोर्ट के मुताबिक, बाहरी वायु गुणवत्ता सुधारने के लिए विकास वित्तपोषण का एक प्रतिशत से भी कम हिस्सा उपलब्ध हुआ है।
GCHA का कहना है कि जलवायु योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधन जरूरी हैं। विशेषकर विकासशील देशों को जलवायु कार्रवाई के लिए विकसित देशों से वित्तीय सहायता की आवश्यकता है। पेरिस समझौते के अनुच्छेद 9.1 में विकसित देशों की इस जिम्मेदारी का उल्लेख है।
स्वास्थ्य को केवल अनुकूलन तक सीमित रखना पर्याप्त नहीं
GCHA के प्रोजेक्ट एनालिस्ट टोला क्लाबो के अनुसार, जलवायु परिवर्तन और स्वास्थ्य के संबंध को अक्सर केवल अनुकूलन यानी बदलती परिस्थितियों के अनुरूप तैयारी तक सीमित कर दिया जाता है। जबकि उत्सर्जन घटाने, वायु गुणवत्ता सुधारने और स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने से भी व्यापक स्वास्थ्य लाभ हासिल किए जा सकते हैं।
यदि सरकारें इन सह-लाभों को नजरअंदाज करती हैं, तो स्वास्थ्य व्यवस्था पर दबाव बढ़ सकता है और भविष्य में जलवायु संबंधी नुकसान की भरपाई अधिक महंगी साबित हो सकती है।
रिपोर्ट में नेपाल में बाढ़, अफ्रीका में खाद्य असुरक्षा, यूरोप और अमेरिका में भीषण गर्मी तथा कनाडा में जंगलों की आग जैसी घटनाओं का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन के स्वास्थ्य संबंधी प्रभाव तेजी से सामने आ रहे हैं।
COP31 से जलवायु वित्त और स्वास्थ्य पर उम्मीदें
रिपोर्ट में आगामी COP31 सम्मेलन को जलवायु कार्रवाई और स्वास्थ्य संबंधी प्राथमिकताओं को मजबूत करने के अवसर के रूप में देखा गया है। इसमें जलवायु वित्त, विकासशील देशों को सहायता और उत्सर्जन घटाने के उपायों पर अधिक प्रभावी वैश्विक सहयोग की जरूरत बताई गई है।
GCHA की कार्यकारी निदेशक डॉ. जेनी मिलर के अनुसार, जलवायु नीति में स्वास्थ्य और वायु गुणवत्ता को शामिल करने से लोगों की सुरक्षा के साथ आर्थिक लाभ भी बढ़ सकते हैं। इससे मजबूत जलवायु नीतियों के लिए जनसमर्थन जुटाने में भी मदद मिल सकती है।
निष्कर्ष: भारत को मिले दो अंक केवल एक स्कोरकार्ड का आंकड़ा नहीं, बल्कि जलवायु नीति में जनस्वास्थ्य, वायु प्रदूषण नियंत्रण, वित्तीय संसाधनों और जवाबदेही को अधिक महत्व देने की जरूरत की ओर संकेत करते हैं। जलवायु परिवर्तन से निपटने की रणनीति तभी व्यापक और प्रभावी होगी, जब उत्सर्जन घटाने के साथ नागरिकों की सांसों, स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता को भी केंद्र में रखा जाएगा।
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