Thursday, October 29

रामायण-महाभारत पर वीडियो गेम बनाने की सलाह से सियासी बहस तेज, विपक्ष ने उठाए धार्मिक आस्था से जुड़े सवाल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बयान पर कांग्रेस सांसद सुप्रिया श्रीनेत की प्रतिक्रिया; पौराणिक ग्रंथों को ‘किस्से-कहानी’ बताने के संदर्भ पर छिड़ी बहस

(SDNA) नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रामायण और महाभारत पर आधारित वीडियो गेम बनाने के सुझाव को लेकर राजनीतिक बहस शुरू हो गई है। विपक्ष के कुछ नेताओं ने इस बयान के संदर्भ और शब्दों पर सवाल उठाते हुए इसे धार्मिक आस्था से जोड़कर देखा है। वहीं, इस मामले में प्रधानमंत्री के पूरे बयान और उसके संदर्भ को समझना भी जरूरी है।

12 जनवरी 2026 को आयोजित ‘विकसित भारत यंग लीडर्स डायलॉग’ के समापन सत्र में प्रधानमंत्री मोदी ने युवाओं से भारतीय पौराणिक कथाओं और सांस्कृतिक विरासत को आधुनिक गेमिंग के माध्यम से दुनिया तक पहुंचाने की संभावनाओं पर विचार करने का आह्वान किया था। उन्होंने रामायण और महाभारत का उल्लेख करते हुए भगवान हनुमान से जुड़ी गेमिंग संभावनाओं की भी बात कही थी।

इस बयान के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाओं में धार्मिक आस्था और व्यावसायिक मनोरंजन के बीच संबंध को लेकर सवाल उठाए गए। विपक्ष की ओर से यह तर्क सामने आया कि रामायण और महाभारत केवल मनोरंजन की कहानियां नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था, सांस्कृतिक परंपरा और जीवन-मूल्यों से जुड़े ग्रंथ हैं।

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सुप्रिया श्रीनेत ने उठाया आस्था का मुद्दा

कांग्रेस नेता सुप्रिया श्रीनेत ने प्रधानमंत्री के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि मोदी जी के लिए रामायण और महाभारत किस्से-कहानियां हो सकते हैं, लेकिन उनके लिए ये धर्म और आस्था का विषय हैं। उनकी इस टिप्पणी के माध्यम से विपक्ष ने यह सवाल उठाया कि धार्मिक ग्रंथों को आधुनिक गेमिंग और कमाई के अवसरों से जोड़ते समय उनकी सांस्कृतिक संवेदनशीलता का ध्यान रखा जाना चाहिए।

विपक्ष के कुछ नेताओं ने इस बयान को प्रधानमंत्री की धार्मिक विचारधारा पर सवाल उठाने के लिए भी इस्तेमाल किया। हालांकि, केवल वीडियो गेम बनाने का सुझाव देने के आधार पर किसी व्यक्ति को हिंदू-विरोधी विचारधारा वाला घोषित करना एक राजनीतिक निष्कर्ष है, जिसकी पुष्टि इस बयान से अपने आप नहीं होती।

संस्कृति, तकनीक और कारोबार के बीच बहस

प्रधानमंत्री के सुझाव का एक पक्ष यह भी है कि भारतीय महाकाव्यों और पौराणिक पात्रों पर आधारित गेम, एनिमेशन तथा डिजिटल सामग्री के जरिए भारतीय संस्कृति को वैश्विक दर्शकों तक पहुंचाया जा सकता है। इससे गेमिंग उद्योग, रचनात्मक क्षेत्र और युवाओं के लिए रोजगार तथा उद्यमिता के अवसर पैदा होने की संभावना भी है।

दूसरी ओर, आलोचकों का मानना है कि धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीकों को व्यावसायिक उत्पादों में बदलते समय उनकी गरिमा, परंपरा और श्रद्धालुओं की भावनाओं का सम्मान होना चाहिए। यही कारण है कि इस मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी के साथ सांस्कृतिक मूल्यों और आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल को लेकर भी चर्चा हो रही है।

बयान के संदर्भ को समझना जरूरी

उपलब्ध विवरण के अनुसार, प्रधानमंत्री ने भारतीय कथाओं पर आधारित गेम बनाने की संभावना की बात की थी। उनके बयान में रामायण और महाभारत को भारत की कहानियों के रूप में प्रस्तुत किया गया। इस कथन को धार्मिक ग्रंथों का अपमान या उन्हें जानबूझकर तुच्छ बताने वाला बयान मानने के लिए अतिरिक्त संदर्भ और प्रमाण आवश्यक हैं।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि यह टिप्पणी जनवरी 2026 में ‘विकसित भारत यंग लीडर्स डायलॉग’ के दौरान की गई थी, न कि ‘मन की बात’ कार्यक्रम में।

निष्कर्ष: रामायण और महाभारत पर वीडियो गेम बनाने के सुझाव ने धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक विरासत, आधुनिक तकनीक और व्यावसायिक अवसरों को लेकर बहस को जन्म दिया है। विपक्ष ने इसे आस्था के नजरिये से चुनौती दी है, जबकि बयान का मूल संदर्भ भारतीय कथाओं को गेमिंग के माध्यम से लोकप्रिय बनाने की संभावना से जुड़ा था। इस विवाद को समझने के लिए राजनीतिक आरोपों और प्रधानमंत्री के वास्तविक शब्दों के बीच अंतर करना आवश्यक है।

SDNA — राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय डिजिटल समाचार नेटवर्क