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मध्य प्रदेश की सियासत में बड़े उलटफेर की आहट? मोहन सरकार पर दबाव, क्या ‘मामा’ की वापसी की अटकलों को मिलेगा नया आधार!

मुख्यमंत्री बदलने से लेकर मंत्रिमंडल में फेरबदल तक की चर्चाएं तेज; शिवराज सिंह चौहान की सक्रियता, कैलाश विजयवर्गीय, नरेंद्र सिंह तोमर और प्रह्लाद पटेल जैसे दिग्गजों की राजनीतिक भूमिका पर निगाहें; जमीन खरीद विवाद और दूसरे मुद्दों ने सरकार को विपक्ष के सवालों के घेरे में रखा

भोपाल। मध्य प्रदेश की राजनीति में इन दिनों नेतृत्व, सत्ता-संतुलन और भाजपा के भीतर बदलते समीकरणों को लेकर चर्चाओं का दौर जारी है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व वाली सरकार के भविष्य को लेकर राजनीतिक गलियारों में तरह-तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। कहीं मंत्रिमंडल में बड़े फेरबदल की चर्चा है तो कहीं मुख्यमंत्री पद पर बदलाव और पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान यानी ‘मामा’ की प्रदेश की राजनीति में संभावित वापसी को लेकर कयास लगाए जा रहे हैं।

हालांकि, मुख्यमंत्री को हटाने या शिवराज सिंह चौहान को दोबारा मध्य प्रदेश की कमान सौंपने के संबंध में भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व की ओर से कोई आधिकारिक घोषणा सामने नहीं आई है। ऐसे में फिलहाल इन चर्चाओं को राजनीतिक अटकलों के रूप में ही देखा जाना चाहिए। लेकिन जिस तरह प्रदेश के कुछ मुद्दों पर सरकार और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के बयान सामने आए हैं, उसने भाजपा के अंदरूनी राजनीतिक समीकरणों को चर्चा के केंद्र में जरूर ला दिया है।

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क्या मोहन सरकार के सामने बढ़ रही हैं राजनीतिक चुनौतियां?

दिसंबर 2023 में भाजपा ने मध्य प्रदेश में सत्ता बरकरार रखने के बाद शिवराज सिंह चौहान की जगह डॉ. मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनाया था। उस समय पार्टी के इस फैसले ने राजनीतिक विश्लेषकों से लेकर आम जनता तक को चौंका दिया था। मुख्यमंत्री पद की दौड़ में शिवराज सिंह चौहान के अलावा नरेंद्र सिंह तोमर, प्रह्लाद सिंह पटेल और कैलाश विजयवर्गीय जैसे वरिष्ठ नेताओं के नाम भी चर्चा में रहे थे।

मोहन यादव के नेतृत्व में सरकार को लगभग तीन वर्ष पूरे होने की ओर बढ़ते समय अब यह सवाल उठ रहा है कि क्या भाजपा प्रदेश में नेतृत्व और संगठन के स्तर पर कोई बड़ा बदलाव करने की तैयारी कर रही है?

सितंबर 2026 में भाजपा ने मध्य प्रदेश के लिए बिप्लब कुमार देब को प्रदेश प्रभारी और चंद्रशेखर को प्रदेश संगठन महामंत्री की जिम्मेदारी सौंपी। इन नियुक्तियों को आगामी पंचायत और नगरीय निकाय चुनावों की तैयारियों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना गया। साथ ही, पार्टी के भीतर नेतृत्व और संगठन के तालमेल को लेकर चल रही चर्चाओं ने भी राजनीतिक अटकलों को हवा दी। हालांकि, संगठनात्मक नियुक्तियां अपने आप में मुख्यमंत्री बदलने का संकेत नहीं हैं।

‘मामा’ की वापसी की चर्चा, लेकिन शिवराज पहले ही दे चुके हैं अपना रुख

मध्य प्रदेश की राजनीति में शिवराज सिंह चौहान का प्रभाव आज भी एक महत्वपूर्ण राजनीतिक विषय बना हुआ है। चार बार मुख्यमंत्री रह चुके शिवराज प्रदेश में ‘मामा’ के नाम से पहचाने जाते हैं। महिला मतदाताओं के बीच उनकी लोकप्रियता और लाड़ली बहना योजना से जुड़ी उनकी राजनीतिक पहचान को भाजपा की पिछली चुनावी सफलता के संदर्भ में भी देखा जाता रहा है।

हाल के महीनों में शिवराज सिंह चौहान की कुछ सार्वजनिक टिप्पणियों ने प्रदेश की राजनीति में नई चर्चा पैदा की। अक्टूबर 2026 में विदिशा क्षेत्र के कोसमी गांव में आदिवासी परिवारों के घरों को हटाए जाने के मामले पर उन्होंने आपत्ति जताई। उन्होंने अधिकारियों की कार्रवाई पर सवाल उठाए और लाड़ली बहना योजना को जारी रखने की जरूरत पर भी जोर दिया। इन बयानों के बाद मुख्यमंत्री मोहन यादव की सरकार और शिवराज के बीच राजनीतिक समीकरणों को लेकर चर्चाएं तेज हुईं।

लेकिन इस पूरे घटनाक्रम का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष भी है। अगस्त 2026 में देवास में पत्रकारों से बातचीत के दौरान शिवराज सिंह चौहान ने मध्य प्रदेश की राजनीति में वापसी की संभावना से इनकार किया था। उन्होंने केंद्रीय मंत्री के रूप में अपनी जिम्मेदारियों और देश की सेवा को प्राथमिकता बताया था।

ऐसे में ‘मामा की वापसी’ की चर्चाओं को फिलहाल राजनीतिक अटकलों से आगे नहीं माना जा सकता। फिर भी प्रदेश भाजपा की राजनीति में उनका प्रभाव और उनकी सार्वजनिक सक्रियता लगातार चर्चा का विषय बनी हुई है।

कैलाश विजयवर्गीय, नरेंद्र सिंह तोमर और प्रह्लाद पटेल की भूमिका पर भी निगाहें

मध्य प्रदेश भाजपा की राजनीति में कई ऐसे वरिष्ठ नेता हैं जिनका अपना राजनीतिक आधार और संगठन में प्रभाव रहा है। कैलाश विजयवर्गीय, नरेंद्र सिंह तोमर और प्रह्लाद सिंह पटेल इनमें प्रमुख नाम हैं।

कैलाश विजयवर्गीय प्रदेश की राजनीति के अनुभवी चेहरों में शामिल हैं। नरेंद्र सिंह तोमर का संगठन और संसदीय राजनीति में लंबा अनुभव रहा है, जबकि प्रह्लाद सिंह पटेल भी प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण राजनीतिक जिम्मेदारियां निभा चुके हैं। वर्ष 2023 में मुख्यमंत्री चयन के दौरान इन नेताओं के नाम भी संभावित दावेदारों के रूप में चर्चा में आए थे।

वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में इन नेताओं की भूमिका को लेकर चर्चाएं होना स्वाभाविक है। हालांकि, इनके बीच मुख्यमंत्री पद को लेकर किसी संगठित दावेदारी या आपसी प्रतिस्पर्धा की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। भाजपा की राजनीति में अंतिम फैसला केंद्रीय नेतृत्व और विधायक दल की प्रक्रिया के माध्यम से ही सामने आता है।

ऐसे में इन वरिष्ठ नेताओं की राजनीतिक सक्रियता, सरकार के साथ उनके संबंध और संगठन में उनकी भूमिका आने वाले समय में प्रदेश की राजनीति के महत्वपूर्ण पहलू रहेंगे।

जमीन खरीद विवाद ने बढ़ाई सरकार की मुश्किलें, कांग्रेस ने उठाए गंभीर सवाल

मोहन सरकार के सामने सबसे चर्चित राजनीतिक विवादों में उज्जैन में जमीन खरीद से जुड़ा मामला भी शामिल है। जून 2026 में द इंडियन एक्सप्रेस की एक पड़ताल में सरकारी भूमि अभिलेखों के आधार पर दावा किया गया कि मुख्यमंत्री मोहन यादव के परिवार के सदस्यों और उनसे जुड़ी रियल एस्टेट कंपनियों ने दिसंबर 2023 से दिसंबर 2025 के बीच उज्जैन में 137 भूखंड खरीदे, जिनका कुल क्षेत्रफल लगभग 168 एकड़ और बताया गया मूल्य करीब 45 करोड़ रुपये था।

रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया कि इन भूखंडों का एक बड़ा हिस्सा उन सड़कों और राजमार्ग परियोजनाओं के आसपास स्थित है, जिनकी घोषणा मुख्यमंत्री बनने के बाद राज्य सरकार ने की थी। इस रिपोर्ट के बाद कांग्रेस ने सरकार पर गंभीर आरोप लगाए और मामले की जांच की मांग की।

भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने इन आरोपों को निराधार और राजनीतिक रूप से प्रेरित बताया। भाजपा का पक्ष रहा कि मुख्यमंत्री और उनके निकट परिवार के सदस्यों की व्यक्तिगत संपत्ति में मुख्यमंत्री बनने के बाद कथित तौर पर कोई अनुचित बढ़ोतरी नहीं हुई और रिश्तेदारों के स्वतंत्र कारोबारी लेन-देन को मुख्यमंत्री से जोड़ना गलत है।

इस मामले में आरोप और राजनीतिक बचाव दोनों सार्वजनिक रूप से सामने आए हैं। इसलिए इसे सिद्ध घोटाला बताना उचित नहीं होगा। लेकिन जमीन खरीद से जुड़े सवालों, सरकारी परियोजनाओं और संभावित हितों के टकराव को लेकर पारदर्शिता की मांग ने सरकार पर राजनीतिक दबाव जरूर बढ़ाया है।

आदिवासी परिवारों का मामला और लाड़ली बहना योजना भी बनी राजनीतिक चर्चा का केंद्र

प्रदेश में आदिवासी परिवारों के घर हटाए जाने का मामला भी सरकार के लिए राजनीतिक रूप से संवेदनशील रहा है। विदिशा जिले के कोसमी गांव में 12 आदिवासी परिवारों के मकानों को हटाए जाने की घटना पर शिवराज सिंह चौहान ने सार्वजनिक रूप से आपत्ति जताई थी। इसके बाद मुख्यमंत्री मोहन यादव ने मामले की जांच के निर्देश दिए।

इस घटनाक्रम ने एक अलग तरह की राजनीतिक चर्चा को जन्म दिया। एक ओर सरकार प्रशासनिक कार्रवाई और नियमों की बात कर रही थी, वहीं दूसरी ओर भाजपा के वरिष्ठ नेता द्वारा सार्वजनिक रूप से सवाल उठाए जाने को पार्टी के भीतर जवाबदेही और समन्वय के नजरिये से देखा गया।

इसी दौरान लाड़ली बहना योजना को लेकर भी शिवराज सिंह चौहान ने इसके लगातार जारी रहने की जरूरत बताई। यह योजना मध्य प्रदेश की राजनीति में एक महत्वपूर्ण मुद्दा रही है। लाभार्थियों को मिलने वाली आर्थिक सहायता, योजना की निरंतरता और राज्य के बजट पर इसके प्रभाव को लेकर सरकार के सामने वित्तीय और राजनीतिक दोनों तरह की जिम्मेदारियां हैं।

मंत्रिमंडल में फेरबदल की संभावना, क्या बदलेगा सत्ता का समीकरण?

जुलाई 2026 में मुख्यमंत्री मोहन यादव ने मंत्री लक्ष्मण पटेल से पशुपालन एवं डेयरी विकास विभाग वापस लेकर अपने पास रख लिया था। इसके बाद मंत्रिमंडल के कामकाज की समीक्षा और संभावित फेरबदल को लेकर चर्चाएं तेज हुई थीं।

इस घटनाक्रम ने यह संकेत जरूर दिया कि मुख्यमंत्री मंत्रियों के विभागों और प्रशासनिक कामकाज में बदलाव कर सकते हैं। लेकिन किसी मंत्री का विभाग बदला जाना और मुख्यमंत्री पद पर परिवर्तन होना दो अलग-अलग राजनीतिक प्रक्रियाएं हैं।

भाजपा के लिए मंत्रिमंडल में फेरबदल एक ऐसा विकल्प हो सकता है जिसके जरिए क्षेत्रीय और सामाजिक समीकरणों को साधने, मंत्रियों की जवाबदेही तय करने और संगठन के साथ तालमेल बेहतर करने का प्रयास किया जा सके। हालांकि, किसी बड़े फेरबदल की अंतिम रूपरेखा और समय को लेकर आधिकारिक पुष्टि आवश्यक है।

भाजपा के सामने 2028 की चुनौती, सत्ता और संगठन दोनों पर नजर

मध्य प्रदेश में अगला विधानसभा चुनाव 2028 के अंत में होना प्रस्तावित है। इससे पहले 2027 में पंचायत और नगरीय निकाय चुनाव भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होंगे। भाजपा के लिए इन चुनावों में संगठनात्मक मजबूती, सरकार की योजनाओं का प्रभाव और जनता के बीच अपनी उपलब्धियों का आकलन अहम रहेगा।

विपक्ष लगातार जमीन विवाद, प्रशासनिक फैसलों, किसानों, युवाओं, रोजगार और स्थानीय समस्याओं जैसे मुद्दों पर सरकार को घेरने की कोशिश कर रहा है। दूसरी ओर भाजपा के सामने अपनी सरकार के कामकाज को जनता तक पहुंचाने और संगठन में एकजुटता बनाए रखने की चुनौती है।

यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि प्रदेश में व्यापक सत्ता-विरोधी माहौल बन चुका है। इसके लिए जनमत सर्वेक्षण, चुनावी रुझान और जमीनी स्तर के ठोस आंकड़ों की जरूरत होगी। लेकिन विपक्ष द्वारा उठाए जा रहे मुद्दे और सरकार के सामने आ रही राजनीतिक चुनौतियां आने वाले समय में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

क्या भाजपा मुख्यमंत्री बदलेगी या मोहन यादव के नेतृत्व में ही आगे बढ़ेगी?

मध्य प्रदेश की मौजूदा राजनीतिक स्थिति में सबसे बड़ा सवाल यही है कि भाजपा केंद्रीय नेतृत्व प्रदेश में किसी बड़े नेतृत्व परिवर्तन का फैसला करेगा या मोहन यादव के नेतृत्व में ही सरकार और संगठन को आगे बढ़ाया जाएगा।

भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व आमतौर पर राज्यों में सत्ता और संगठन के समीकरणों को ध्यान में रखकर निर्णय लेता है। मध्य प्रदेश में भी पार्टी के सामने 2028 के विधानसभा चुनाव से पहले सरकार की छवि, वरिष्ठ नेताओं की भूमिका, सामाजिक समीकरण और संगठनात्मक मजबूती जैसे कई पहलू हैं।

शिवराज सिंह चौहान की राजनीतिक विरासत, कैलाश विजयवर्गीय का अनुभव, नरेंद्र सिंह तोमर की संगठनात्मक भूमिका और प्रह्लाद पटेल जैसे वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी प्रदेश भाजपा की राजनीति को बहुआयामी बनाती है। वहीं मुख्यमंत्री मोहन यादव के सामने अपने नेतृत्व में सरकार के कामकाज और राजनीतिक पकड़ को लगातार मजबूत रखने की जिम्मेदारी है।

फिलहाल मुख्यमंत्री परिवर्तन की कोई आधिकारिक घोषणा नहीं है और शिवराज सिंह चौहान भी प्रदेश की राजनीति में लौटने से इनकार कर चुके हैं। लेकिन जमीन विवाद, आदिवासी परिवारों का मामला, मंत्रियों के विभागों में बदलाव और वरिष्ठ नेताओं के सार्वजनिक बयानों ने प्रदेश की राजनीति को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

अब निगाहें भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व के अगले कदम, प्रदेश संगठन की गतिविधियों और सरकार के आगामी फैसलों पर रहेंगी। क्या आने वाले महीनों में मंत्रिमंडल में बदलाव होगा, क्या संगठनात्मक समीकरण नए रूप में सामने आएंगे या मोहन यादव के नेतृत्व में ही भाजपा 2028 की तैयारी करेगी—इन सवालों के जवाब आने वाला राजनीतिक घटनाक्रम ही देगा।

— सच के पीछे की खबर, सच्‍चा दोस्त न्यूज़ नेटवर्क (SDNA)