Saturday, October 10

भोजपुरी की बुलंद आवाज, लेकिन भाषा नहीं थी मातृभाषा; कल्पना पटवारी की कहानी में लोकसंगीत से लेकर डकैतों के बीच मंच तक

चार साल की उम्र में शुरू हुआ गायन का सफर, 32 से ज्यादा भाषाओं में गाए गीत; भिखारी ठाकुर की लोक विरासत को भी दी नई पहचान

नई दिल्ली। भोजपुरी संगीत की दुनिया में कल्पना पटवारी एक जाना-पहचाना नाम हैं। उनकी आवाज में भोजपुरी लोकगीतों की मिठास और लोक संस्कृति की गहरी छाप सुनाई देती है। दिलचस्प बात यह है कि भोजपुरी उनकी मातृभाषा नहीं है। असम में पली-बढ़ीं कल्पना ने अपनी संगीत साधना और भाषा पर मेहनत के दम पर भोजपुरी संगीत में अलग पहचान बनाई।

‘गणेश के पापा’ जैसे लोकप्रिय गीतों से लेकर लोक परंपराओं से जुड़े कई गीतों तक, कल्पना ने भोजपुरी संगीत को देश के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचाने में भूमिका निभाई है।

चार साल की उम्र से मंच पर

कल्पना पटवारी का संगीत से रिश्ता बेहद कम उम्र में शुरू हो गया था। उन्होंने करीब चार साल की उम्र में अपने पिता के साथ सार्वजनिक मंच पर प्रस्तुति देना शुरू किया।

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उनके पिता बिपिन नाथ पटवारी लोकगायक थे। उनसे कल्पना ने असम की कामरूपिया और गोलपोरिया लोक संगीत परंपराओं की शुरुआती शिक्षा हासिल की। आगे चलकर उन्होंने लखनऊ के भातखंडे संगीत संस्थान विश्वविद्यालय से हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में ‘संगीत विशारद’ की शिक्षा ली।

भोजपुरी से लेकर 32 से अधिक भाषाओं तक

कल्पना की खासियत केवल भोजपुरी गायन तक सीमित नहीं रही। उन्होंने भोजपुरी, असमिया, हिंदी, मराठी, बंगाली और अंग्रेजी सहित 32 से अधिक भाषाओं और बोलियों में गीत गाए हैं।

भोजपुरी में उन्होंने पूर्वी, पचरा, कजरी, सोहर, विवाह गीत, चैता और नौटंकी जैसी विभिन्न लोक शैलियों को अपनी आवाज दी। यही विविधता उनके संगीत सफर को अलग पहचान देती है।

भिखारी ठाकुर की विरासत पर भी काम

कल्पना पटवारी ने भोजपुरी लोक रंगमंच और लोकगीतों की परंपरा से जुड़े महान कलाकार भिखारी ठाकुर के कार्यों को भी अपने संगीत के जरिए सामने लाने का प्रयास किया।

उन्होंने भिखारी ठाकुर की रचनात्मक विरासत और उनसे जुड़ी लोक परंपराओं को नए श्रोताओं तक पहुंचाने के लिए कई परियोजनाओं पर काम किया। उनके इस प्रयास में भोजपुरी की पुरानी लोकधुनों और सामाजिक विषयों को आधुनिक श्रोताओं के सामने रखने की कोशिश दिखाई देती है।

गांवों और छोटे कस्बों में भी किया प्रदर्शन

कल्पना ने अपने एक पुराने इंटरव्यू में बताया था कि उनके संगीत सफर में बड़े मंचों के साथ-साथ गांव और छोटे कस्बों के कार्यक्रम भी शामिल रहे हैं। उन्होंने ऐसे स्थानों पर भी प्रस्तुति दी, जहां आधुनिक मंचीय सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं होती थीं।

उनके मुताबिक कुछ जगहों पर बिजली की व्यवस्था नहीं थी और उन्हें दीयों की रोशनी में भी कार्यक्रम करना पड़ा। ऐसे अनुभवों ने उन्हें ग्रामीण समाज और लोक संस्कृति को करीब से समझने का अवसर दिया।

राजनीतिक आयोजनों और कठिन माहौल में भी पहुंचा संगीत

कल्पना ने यह भी बताया था कि उन्होंने राजनीतिक अभियानों के दौरान ऐसे आयोजनों में प्रस्तुति दी, जहां कई प्रभावशाली और आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोग मौजूद रहते थे। शुरुआती दौर में उन्हें ऐसे माहौल से डर भी लगता था, लेकिन समय के साथ मंचीय अनुभव ने उनका आत्मविश्वास बढ़ाया।

यह उनके करियर का वह पहलू है जो दिखाता है कि लोक कलाकारों का मंच केवल बड़े शहरों और व्यवस्थित सभागारों तक सीमित नहीं रहा है।

‘एगो चुम्मा ले ला राजाजी’ ने मचाई चर्चा

कल्पना के चर्चित गीतों में ‘एगो चुम्मा ले ला राजाजी’ भी शामिल रहा है। उन्होंने बताया था कि यह गीत प्रवासी मजदूरों की पृष्ठभूमि से जुड़ी कहानी को सामने रखता है।

गीत में एक महिला अपने पति से भावनात्मक अंदाज में संवाद करती है, जो काम के सिलसिले में बाहर जाने वाला है। गीत की प्रस्तुति और विषय ने इसे खासा चर्चित बनाया।

कल्पना के अनुसार, कुछ आयोजनों में यह गीत बजने पर दर्शकों की ओर से उत्साह में हवाई फायरिंग तक की घटनाएं हुईं। उनके लिए यह अनुभव शुरुआत में चौंकाने वाला था, हालांकि बाद में उन्हें बताया गया कि वहां मौजूद लोग इसे उत्साह और खुशी के प्रदर्शन के रूप में कर रहे थे।

‘गणेश के पापा’ से भी मिली पहचान

कल्पना पटवारी के लोकप्रिय गीतों में ‘गणेश के पापा’ का भी नाम लिया जाता है। यह गीत धार्मिक और लोक रंग से जुड़े कथ्य को मनोरंजक अंदाज में प्रस्तुत करता है और श्रोताओं के बीच उनकी पहचान को और मजबूत करने वाले गीतों में शामिल रहा।

उनकी गायकी की खासियत यह रही कि उन्होंने लोकगीतों को केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उनमें सामाजिक जीवन, रिश्ते, प्रवास, परंपरा और ग्रामीण संस्कृति जैसे विषयों को भी आवाज दी।

असम से भोजपुरी तक का अनोखा सफर

कल्पना पटवारी की कहानी इस मायने में खास है कि एक असमिया पृष्ठभूमि से आने वाली कलाकार ने भोजपुरी लोकसंगीत में अपनी मजबूत जगह बनाई। भाषा उनके लिए शुरुआत में परिचित क्षेत्र नहीं थी, लेकिन संगीत की समझ, लोक परंपराओं का अध्ययन और लगातार अभ्यास ने उन्हें भोजपुरी के बड़े नामों में शामिल कर दिया।

उनका सफर यह भी दिखाता है कि भारतीय लोकसंगीत की दुनिया भाषाई सीमाओं से कहीं बड़ी है। अलग-अलग क्षेत्रों की परंपराएं जब एक कलाकार की आवाज के जरिए आपस में जुड़ती हैं, तो संगीत का दायरा भी उसी के साथ विस्तार पाता है।

(SDNA)