
‘रेट्रो वाइब्स’ में सजी संगीत संध्या में पुराने फिल्मी गीतों की सुरमयी यात्रा; कलाकारों की प्रस्तुतियों ने श्रोताओं को पहुंचाया स्वर्णिम संगीत युग में
उज्जैन | SDNA
कुछ गीत समय के साथ पुराने नहीं होते, बल्कि हर नई पीढ़ी के साथ उनकी मिठास और गहरी होती जाती है। उज्जैन के कालिदास अभिरंग नाट्य गृह में ऐसी ही सदाबहार धुनों से सजी शाम ने श्रोताओं को हिंदी फिल्म संगीत के उस दौर की याद दिला दी, जब गीतों में सादगी, आवाज में ठहराव और धुनों में भावनाओं की गहराई हुआ करती थी।
अवसर था ‘रेट्रो वाइब्स’ संगीत संध्या का, जिसमें महान संगीतकार एवं पार्श्वगायक हेमंत कुमार और तलत महमूद के गीतों को स्वर देकर स्वर्णिम दौर की संगीत यात्रा को एक बार फिर मंच पर जीवंत किया गया।
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दीप प्रज्वलन से शुरू हुई सुरों की शाम
स्वर-संगीत द्वारा आयोजित कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। इसके बाद कलाकारों ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत कर संगीत संध्या का विधिवत आगाज किया।
शुरुआती वंदना के बाद जैसे ही हेमंत कुमार और तलत महमूद के दौर के गीतों की स्वर लहरियां सभागार में गूंजीं, माहौल पूरी तरह रेट्रो रंग में रंग गया।
छह कलाकारों ने सुरों से रचा पुराना दौर
कार्यक्रम के सूत्रधार नितिन पोल ने बताया कि डॉ. परेश रॉय, विनय गुप्ता, योगेश यादव, नंदिता रॉय, पूर्णिमा नाटानी और संगीता लोदवाल ने अपनी प्रस्तुतियों के माध्यम से हेमंत कुमार और तलत महमूद के गीतों को श्रोताओं तक पहुंचाया।
इन प्रस्तुतियों का आकर्षण केवल गीतों की प्रस्तुति नहीं था, बल्कि उन गीतों से जुड़ी भावनाओं और संगीत की उस शैली को मंच पर फिर से महसूस कराना था, जिसने हिंदी फिल्म संगीत को एक विशिष्ट पहचान दी।
आवाजों में लौटी यादों की दुनिया
हेमंत कुमार की गहराई और तलत महमूद की मखमली आवाज से जुड़ी संगीत परंपरा हिंदी फिल्म संगीत के इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय रही है। कार्यक्रम में प्रस्तुत गीतों ने श्रोताओं को उसी दौर की यादों से जोड़ दिया।
आज जब संगीत की दुनिया में तकनीक, तेज बीट और नए प्रयोग तेजी से बढ़ रहे हैं, ऐसे आयोजन श्रोताओं को यह अनुभव कराते हैं कि संगीत की लोकप्रियता केवल उसकी नवीनता में नहीं, उसकी भावनात्मक स्थायित्व में भी होती है।
संगीत ने पीढ़ियों के बीच बनाया पुल
‘रेट्रो वाइब्स’ जैसी संगीत संध्या का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी रहा कि पुराने दौर के गीत केवल उस पीढ़ी तक सीमित नहीं रहे, जिसने उन्हें पहली बार सुना था। मंचीय प्रस्तुतियों के माध्यम से वे गीत नई पीढ़ी के सामने भी पहुंचे।
यही पुराने संगीत की खासियत है—धुन पुरानी हो सकती है, लेकिन भावना कभी पुरानी नहीं होती।
आभार के साथ हुआ समापन
कार्यक्रम के अंत में डॉ. परेश रॉय ने आभार प्रदर्शन किया। कलाकारों, आयोजकों और संगीत प्रेमियों की सहभागिता ने इस शाम को यादगार बनाया।
खबर के पीछे का अर्थ : पुराने गीतों की वापसी, केवल नॉस्टेल्जिया नहीं
इस संगीत संध्या का महत्व केवल एक रेट्रो कार्यक्रम आयोजित होने तक सीमित नहीं है। यह उस दौर के संगीत को संरक्षित करने की दिशा में भी एक सांस्कृतिक प्रयास माना जा सकता है, जिसमें शब्द, धुन और गायकी तीनों मिलकर कहानी कहते थे।
आज डिजिटल प्लेटफॉर्म ने संगीत को दुनिया के हर कोने तक पहुंचा दिया है, लेकिन इसी तेज बदलाव के बीच पुराने संगीत को मंच पर सुनना श्रोताओं को संगीत की ऐतिहासिक यात्रा से जोड़ता है।
ऐसे आयोजन यदि नियमित रूप से होते रहें और इनमें वरिष्ठ कलाकारों के साथ युवा गायकों को भी जोड़ा जाए, तो यह पुरानी संगीत विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रभावी माध्यम बन सकते हैं।
उज्जैन जैसे सांस्कृतिक शहर में इस तरह की संगीत संध्याएं स्थानीय कला वातावरण को भी समृद्ध करती हैं और शहर को केवल धार्मिक एवं ऐतिहासिक पहचान से आगे संगीत और सांस्कृतिक गतिविधियों के केंद्र के रूप में स्थापित करने में योगदान दे सकती हैं।
(SDNA)



