
स्टेट प्रेस क्लब, म.प्र. की परिचर्चा में विशेषज्ञों ने जताई चिंता; 2027 नहीं, वर्ष 2057 की जरूरतों को ध्यान में रखकर जल प्रबंधन की नीति बनाने पर दिया जोर
(SDNA) इंदौर। इस वर्ष मानसून में औसत से कम बारिश होने के कारण इंदौर में आने वाले समय में जल संकट और गंभीर रूप ले सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस चुनौती से निपटने के लिए केवल नगर निगम या प्रशासन के भरोसे नहीं रहा जा सकता, बल्कि प्रत्येक नागरिक को पानी के संरक्षण और जिम्मेदार उपयोग की आदत अपनानी होगी। जल संग्रहण के साथ-साथ उपलब्ध पानी का सुनियोजित प्रबंधन भी उतना ही जरूरी है।
इंदौर की जलापूर्ति का बड़ा हिस्सा लगभग 70 किलोमीटर दूर स्थित नर्मदा नदी से आने वाले पानी पर निर्भर है। इसके बावजूद शहर में नर्मदा जल का समान और प्रभावी वितरण नहीं हो पा रहा है। जल की बर्बादी, भूजल का लगातार गिरता स्तर और वितरण व्यवस्था की खामियां समस्या को और जटिल बना रही हैं। ऐसे में नागरिकों को पानी का महत्व समझते हुए उसका संरक्षण करने और अनावश्यक उपयोग से बचने की जरूरत है।
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ये महत्वपूर्ण विचार स्टेट प्रेस क्लब, मध्यप्रदेश द्वारा अभिनव कला समाज सभागार में आयोजित ‘जल संकट से जल सुरक्षा’ विषयक परिचर्चा में विभिन्न विशेषज्ञों और वक्ताओं ने व्यक्त किए। परिचर्चा में भूजल संरक्षण, नर्मदा जल वितरण, वर्षा जल संग्रहण, पर्यावरण संतुलन और भविष्य की जल आवश्यकताओं पर विस्तार से चर्चा हुई।
भूजल स्तर हजार फीट तक पहुंचना गंभीर चेतावनी: सुधीन्द्र मोहन शर्मा
भारत सरकार के पेयजल मिशन के निदेशक एवं भूवैज्ञानिक सुधीन्द्र मोहन शर्मा ने कहा कि इंदौर की अपनी कोई नदी नहीं है। शहर नर्मदा नदी से पानी प्राप्त करता है, जबकि स्थानीय स्तर पर भूजल ही पानी का प्रमुख स्रोत है। उन्होंने बताया कि लगभग 75 वर्ष पहले शहर में कुओं और बावड़ियों के माध्यम से जल संग्रहण एवं आपूर्ति की व्यवस्था थी। इसके बाद हैंडपंप का दौर आया, जब 30 से 75 फीट की गहराई पर पानी उपलब्ध हो जाता था। इसी दौरान कुछ तालाबों का भी निर्माण हुआ।
लेकिन आज स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। भूजल का स्तर कई स्थानों पर लगभग एक हजार फीट तक पहुंच गया है, जो बेहद चिंताजनक है। उन्होंने बताया कि करीब साढ़े छह करोड़ वर्ष पहले ज्वालामुखी से निकला लावा ठंडा होकर चट्टानों में परिवर्तित हुआ था। इन्हीं चट्टानों के बीच मौजूद संरचनाओं से भूजल निकाला जाता है। भूगर्भीय स्थिति ऐसी है कि किसी निश्चित पैमाने से हर स्थान पर पानी की उपलब्धता का सटीक अनुमान लगाना आसान नहीं है।
शर्मा ने कहा कि इंदौर में इजराइल जैसे देश की तुलना में ढाई गुना अधिक बारिश हुई है। इसलिए परिस्थितियां पूरी तरह निराशाजनक नहीं हैं, लेकिन दूरदर्शिता के साथ योजना बनाने की आवश्यकता है। हमें केवल वर्ष 2027 की जरूरतों को नहीं, बल्कि वर्ष 2057 की जल आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर तैयारी करनी होगी।
उन्होंने शहर का भूजल स्तर दर्शाने वाला विस्तृत नक्शा तैयार करने, प्रशासन द्वारा 15 स्थानों पर लगाए गए पीजोमीटर की नियमित निगरानी करने और फ्लो मीटर लगाने की जरूरत बताई। इससे भूजल की उपलब्धता और उसके दोहन की मात्रा का आकलन किया जा सकेगा।
उन्होंने केंद्रीय भूजल बोर्ड की रिपोर्ट का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रत्येक स्थान पर वाटर रिचार्ज सिस्टम लगाने से यह जरूरी नहीं कि वर्षा का पानी जमीन के भीतर पहुंच ही जाए। इंदौर में केवल आठ प्रतिशत स्थान ऐसे हैं, जहां बेहतर भूजल पुनर्भरण की संभावना है। उन्होंने बताया कि नगर निगम इंदौर की जल नीति तैयार करने की दिशा में काम कर रहा है और नागरिक इसमें अपने सुझाव दे सकते हैं।
नर्मदा का पानी कहां जा रहा है, वितरण व्यवस्था पर उठे सवाल
एसजीएसआईटीएस के सिविल इंजीनियरिंग विभागाध्यक्ष प्रो. डॉ. संदीप नरुलकर ने इंदौर की जल वितरण व्यवस्था में असमानता पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि शहर में नर्मदा जल का वितरण समान रूप से नहीं हो रहा है। उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार, इंदौर की लगभग 54 प्रतिशत आबादी तक नर्मदा का पानी पहुंचता है, जबकि शेष क्षेत्रों में बोरिंग और टैंकरों के माध्यम से जलापूर्ति की जाती है।
उन्होंने कहा कि रहवासियों को एक दिन छोड़कर नर्मदा का पानी मिलता है और जलापूर्ति से जुड़े आंकड़ों में भी भ्रम की स्थिति है। नगर निगम का दावा है कि नर्मदा परियोजना से प्रतिदिन 360 मिलियन लीटर पानी इंदौर पहुंचता है, जबकि बोरिंग से करीब 75 मिलियन लीटर पानी प्राप्त होता है। इसके बावजूद वास्तविक जल वितरण लगभग 243 मिलियन लीटर ही बताया जाता है। ऐसे में सवाल उठता है कि शेष पानी का उपयोग कहां हो रहा है?
डॉ. नरुलकर ने चिंता जताई कि नर्मदा से इंदौर तक पानी लाने में अत्यधिक बिजली खर्च होती है। इतनी महंगी व्यवस्था से पानी मिलने के बावजूद उसका जिम्मेदारी से उपयोग नहीं किया जा रहा है।
उन्होंने चेताया कि आने वाले वर्ष में जनवरी और फरवरी का समय किसी तरह निकल सकता है, लेकिन मार्च में जल संकट की वास्तविक चुनौती सामने आ सकती है। इसलिए सबसे पहले वाटर लीकेज और पानी की बर्बादी रोकने पर ध्यान देना होगा। निजी हाइड्रेंट वाटर टैंकर सेवाओं और कार वॉश सेंटरों के संचालन के लिए भी स्पष्ट नीति बनाने की आवश्यकता है।
बारिश के पानी का सही प्रबंधन हो तो 16 महीने तक मिल सकती है राहत: डॉ. दिलीप बाघेला
पर्यावरणविद् डॉ. दिलीप बाघेला ने कहा कि इंदौर जिले में औसतन 35 इंच बारिश होती है। यदि इस वर्षा जल का योजनाबद्ध तरीके से संरक्षण किया जाए, तो लगभग 16 महीने तक पानी की जरूरतें पूरी की जा सकती हैं। लेकिन जल प्रबंधन की कमी का खामियाजा पूरे शहर को भुगतना पड़ रहा है।
उन्होंने कहा कि कम बारिश का असर केवल शहरी क्षेत्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्रामीण इलाकों में स्थिति और भी गंभीर है। खेतों में सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध नहीं होने से बड़ी संख्या में फसलें प्रभावित हो रही हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में टैंकरों से भी हर जगह पानी पहुंचाना संभव नहीं है।
डॉ. बाघेला ने पर्यावरण असंतुलन और नदियों के घटते जलस्तर पर चिंता जताते हुए कहा कि पहले पुनासा, ओंकारेश्वर और यशवंत सागर बांधों में कई बार पानी का ओवरफ्लो होता था, लेकिन अब ऐसी स्थिति धीरे-धीरे अतीत की बात बनती जा रही है।
उन्होंने कहा कि जंगलों का लगभग 30 से 40 प्रतिशत हिस्सा कट चुका है। ऐसे में अच्छी बारिश की उम्मीद करना कठिन होता जा रहा है। उन्होंने पर्यावरण संरक्षण और पेड़ों को बचाने की जरूरत पर जोर देते हुए कहा कि हरियाली और वर्षा के बीच गहरा संबंध है।
उन्होंने नागरिकों से प्रतिदिन प्रति व्यक्ति कम से कम 10 लीटर पानी बचाने का संकल्प लेने की अपील की। उनका कहना था कि जिस गंभीरता से हम अपनी संपत्ति और धन की सुरक्षा करते हैं, उसी तरह पानी को भी भविष्य की अमूल्य पूंजी समझकर सुरक्षित रखना होगा।
घरेलू स्तर पर पानी की बचत से भी मिल सकता है बड़ा लाभ: डॉ. उपासना गुप्ता
देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर की हिंदी एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. उपासना गुप्ता ने कहा कि घरेलू उपयोग में पानी की खपत को नियंत्रित करके बड़ी मात्रा में जल बचाया जा सकता है। एक ही पानी का दोबारा उपयोग करने की आदत भी जल संरक्षण में मददगार साबित हो सकती है।
उन्होंने सुझाव दिया कि घरेलू कामों के बाद बचे उपयोगी पानी को फेंकने के बजाय पेड़-पौधों में इस्तेमाल किया जाए। इसके साथ ही घरों में बिजली की खपत कम करने पर भी ध्यान देना चाहिए।
जल संकट से निपटने के लिए तत्काल ठोस नीति जरूरी: प्रवीण खारीवाल
परिचर्चा की अध्यक्षता करते हुए स्टेट प्रेस क्लब, मध्यप्रदेश के अध्यक्ष प्रवीण खारीवाल ने कहा कि जल संकट से बचने के लिए अभी से योजनाबद्ध तरीके से काम शुरू करना होगा। इसके लिए एक प्रभावी और ठोस जल नीति बनाना समय की सबसे बड़ी जरूरत है।
उन्होंने कहा कि पानी ही भविष्य की सुरक्षा और जीवन का आधार है। इसकी आवश्यकता केवल मनुष्यों को ही नहीं, बल्कि पशु-पक्षियों और पेड़-पौधों को भी है। इसलिए जल संरक्षण को प्राथमिकता देते हुए तत्काल प्रभाव से प्रयास शुरू किए जाने चाहिए।
सामाजिक कार्यकर्ता किशोर कोडवानी ने भी जल के कुप्रबंधन पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि यदि समय रहते पानी के गलत उपयोग और अव्यवस्थित प्रबंधन पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में शहर को गंभीर परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। इसके लिए अभी से ठोस तैयारी करना जरूरी है।
विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने साझा किए सुझाव
कार्यक्रम के प्रारंभ में परिचर्चा के संयोजक राजू घोलप, पंकज क्षीरसागर, प्रवीण जोशी, विजय खंडेलवाल, सुनीता श्रीवास्तव, डॉ. मनीष दवे और नीलेश कांठेड ने अतिथियों का स्वागत किया।
कार्यक्रम का संचालन उमेश पारेख ने किया, जबकि सुनील जैन ने आभार व्यक्त किया। परिचर्चा में बड़ी संख्या में पर्यावरणविद्, सामाजिक कार्यकर्ता और शहर के गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।
परिचर्चा का मूल संदेश स्पष्ट रहा कि इंदौर को भविष्य के जल संकट से बचाने के लिए केवल नर्मदा जल पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा। भूजल संरक्षण, समान जल वितरण, लीकेज पर नियंत्रण, वर्षा जल का वैज्ञानिक प्रबंधन और नागरिकों की सक्रिय भागीदारी को मिलाकर एक दीर्घकालिक जल सुरक्षा नीति तैयार करना समय की मांग है।
(SDNA)



