
प्रेस्टीज समूह के संस्थापक अध्यक्ष का 95 वर्ष की आयु में देवलोकगमन; सोयाबीन उद्योग, शिक्षा और समाजसेवा में योगदान को किया गया याद
इंदौर, 23 सितंबर। (SDNA) देश के प्रतिष्ठित उद्योगपति, शिक्षाविद् और समाजसेवी पद्मश्री डॉ. नेमनाथ जैन का बुधवार सुबह 95 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उन्होंने स्कीम नंबर 74 स्थित प्रेस्टीज विहार निवास पर अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर सामने आते ही इंदौर के उद्योग, शिक्षा, कृषि, सोयाबीन तथा सामाजिक क्षेत्र में शोक की लहर फैल गई।
डॉ. नेमनाथ जैन का अंतिम संस्कार सायाजी मुक्ति धाम में किया गया। अंतिम यात्रा उनके निवास से निकली, जिसमें परिवारजनों के साथ उद्योग जगत, शिक्षाविदों, सामाजिक संस्थाओं और शहर के विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े लोग बड़ी संख्या में शामिल हुए। उनके ज्येष्ठ पुत्र डॉ. डेविश जैन ने उन्हें मुखाग्नि दी। इस दौरान उनके कनिष्ठ पुत्र श्री डीपीन जैन, पौत्र डॉ. हिमांशु जैन, श्री केतन जैन सहित परिवार के अन्य सदस्य मौजूद रहे।
संयोगवश कुछ दिन पहले ही 17 सितंबर को डॉ. जैन का 95वां जन्मदिन मनाया गया था। लगभग एक सदी के जीवन में उन्होंने विस्थापन और संघर्ष से लेकर औद्योगिक विस्तार, शिक्षा संस्थानों के निर्माण और सामाजिक सरोकारों तक की लंबी यात्रा तय की।
विभाजन के बाद इंदौर को बनाया कर्मभूमि
डॉ. नेमनाथ जैन का जन्म तत्कालीन अविभाजित भारत के रावलपिंडी में हुआ था। देश के विभाजन के बाद परिवार के साथ इंदौर पहुंचे डॉ. जैन ने इसी शहर को अपनी कर्मभूमि बनाया। कम उम्र में विस्थापन का सामना करने के बावजूद उन्होंने परिस्थितियों को अपनी प्रगति में बाधा नहीं बनने दिया।
उन्होंने इंदौर के एसजीएसआईटीएस के शुरुआती बैच में मैकेनिकल और इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की शिक्षा प्राप्त की। शिक्षा के साथ नौकरी करते हुए उन्होंने व्यावहारिक अनुभव हासिल किया और आगे चलकर इसी अनुभव को उद्यमिता में बदला।
वर्ष 1977 में पशु आहार संयंत्र की स्थापना के साथ उन्होंने औद्योगिक क्षेत्र में कदम रखा। इसके बाद 1980-81 में सोयाबीन प्रसंस्करण के क्षेत्र में प्रवेश ने उनके कारोबारी सफर को नई दिशा दी। कृषि आधारित उद्योग, खाद्य प्रसंस्करण और खाद्य तेल सहित विभिन्न क्षेत्रों में प्रेस्टीज समूह का विस्तार उनके नेतृत्व में हुआ।
सोयाबीन उद्योग के विकास में उल्लेखनीय भूमिका
मध्यप्रदेश में सोयाबीन उद्योग के विस्तार के साथ डॉ. नेमनाथ जैन का नाम लंबे समय तक जुड़ा रहा। उन्होंने किसानों, प्रसंस्करण उद्योग और सोयाबीन क्षेत्र से जुड़े हितों को आगे बढ़ाने के लिए निरंतर काम किया।
सोयाबीन के क्षेत्र में उनके योगदान के कारण उन्हें “सोयामैन ऑफ द मिलेनियम” के नाम से भी संबोधित किया गया। उनके प्रयासों को केवल कारोबारी विस्तार तक सीमित नहीं माना गया, बल्कि कृषि आधारित अर्थव्यवस्था और प्रसंस्करण उद्योग के विकास से भी जोड़ा गया।
भारत सरकार ने उनके औद्योगिक योगदान को मान्यता देते हुए वर्ष 2020 के पद्म पुरस्कारों में उन्हें व्यापार एवं उद्योग क्षेत्र के लिए पद्मश्री से सम्मानित करने की घोषणा की थी। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने 8 नवंबर 2021 को राष्ट्रपति भवन में उन्हें पद्मश्री प्रदान किया।
शिक्षा के क्षेत्र में खड़ा किया मजबूत आधार
डॉ. नेमनाथ जैन के सार्वजनिक जीवन का एक महत्वपूर्ण पक्ष शिक्षा के प्रति उनकी प्रतिबद्धता रहा। उनका मानना था कि शिक्षा समाज में दीर्घकालिक बदलाव का प्रभावी माध्यम है। इसी विचार को आगे बढ़ाते हुए वर्ष 1994 में प्रेस्टीज एजुकेशन सोसायटी के माध्यम से प्रेस्टीज इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट एंड रिसर्च (पीआईएमआर), इंदौर की स्थापना की गई।
समय के साथ प्रेस्टीज समूह ने प्रबंधन के अलावा इंजीनियरिंग, विधि और अन्य उच्च शिक्षा क्षेत्रों में भी संस्थानों का विस्तार किया। इन संस्थानों के माध्यम से बड़ी संख्या में विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा और व्यावसायिक प्रशिक्षण के अवसर मिले।
उद्योग को समाज निर्माण से जोड़ा
डॉ. जैन की कार्यशैली में उद्योग और सामाजिक विकास को अलग-अलग नहीं देखा जाता था। उनके नेतृत्व में स्थापित संस्थाओं और व्यावसायिक गतिविधियों के माध्यम से रोजगार, शिक्षा, कृषि और सामाजिक विकास से जुड़े विभिन्न क्षेत्रों में काम हुआ।
उनके जीवन की यात्रा विस्थापन से शुरू होकर औद्योगिक निर्माण और शिक्षा के विस्तार तक पहुंची। उन्होंने संघर्षपूर्ण परिस्थितियों में अपनी पहचान बनाई और इंदौर को अपनी कर्मभूमि बनाकर उद्योग तथा शिक्षा के क्षेत्र में स्थायी संस्थागत विरासत तैयार की।
डॉ. नेमनाथ जैन के निधन से प्रेस्टीज समूह, शिक्षा एवं उद्योग जगत के साथ-साथ इंदौर ने एक ऐसे व्यक्तित्व को खो दिया है, जिसकी पहचान उद्यमिता, शिक्षा, सामाजिक सरोकार और सोयाबीन उद्योग से जुड़े योगदान के रूप में रही। उनके द्वारा स्थापित संस्थान और विकसित कार्यपरंपरा आने वाली पीढ़ियों के लिए उनकी विरासत के रूप में बनी रहेगी।
