
इंदौर के राष्ट्रीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान में दो प्रशिक्षण कार्यक्रम; खातेगांव के 16 किसानों ने सीखी आधुनिक उत्पादन तकनीकें, 20 किसानों को प्राकृतिक खेती का प्रायोगिक प्रशिक्षण
इंदौर, 28 सितंबर 2026। (SDNA) सोयाबीन उत्पादन को अधिक टिकाऊ, लाभकारी और मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों के अनुकूल बनाने के उद्देश्य से ICAR-राष्ट्रीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान, इंदौर में किसानों के लिए दो विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए गए। एक प्रशिक्षण मध्यप्रदेश कृषि रोडमैप के तहत देवास जिले के खातेगांव ब्लॉक के किसानों के लिए आयोजित हुआ, जबकि दूसरा कार्यक्रम प्राकृतिक खेती आधारित टिकाऊ सोयाबीन उत्पादन पर केंद्रित रहा।
खातेगांव के किसानों ने सीखी आधुनिक उत्पादन तकनीक
मध्यप्रदेश कृषि रोडमैप कार्यक्रम के अंतर्गत आयोजित प्रशिक्षण में खातेगांव ब्लॉक के 16 चयनित किसानों ने हिस्सा लिया। किसानों को सोयाबीन की उन्नत उत्पादन तकनीक, फसल संरक्षण, नवीन कृषि पद्धतियों तथा उत्पादन के बाद मूल्य संवर्धन और प्रसंस्करण की संभावनाओं के बारे में जानकारी दी गई।
विशेषज्ञों ने किसानों को खरपतवार, कीट एवं रोग प्रबंधन की आधुनिक तकनीकों से अवगत कराया। साथ ही सूखा, जल-अधिकता और मौसम में बदलाव जैसी परिस्थितियों में फसल की उत्पादकता बनाए रखने के लिए जलवायु-अनुकूल तकनीकों एवं उपयुक्त किस्मों के उपयोग पर जोर दिया गया।
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कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने किया किसानों का मार्गदर्शन
कार्यक्रम में केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने ऑनलाइन माध्यम से किसानों एवं वैज्ञानिकों को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि सोयाबीन मध्यप्रदेश की प्रमुख खरीफ फसलों में शामिल है और किसानों की आय तथा उत्पादकता बढ़ाने के लिए आधुनिक एवं टिकाऊ कृषि तकनीकों को खेतों तक पहुंचाना जरूरी है।
उन्होंने किसानों को नई तकनीकों और उन्नत किस्मों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया। मंत्री ने राष्ट्रीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान द्वारा विकसित NRC 150, NRC 268 और NRC 270 किस्मों का उल्लेख करते हुए कहा कि इन किस्मों में अच्छी उत्पादन क्षमता के साथ प्रतिकूल परिस्थितियों में बेहतर प्रदर्शन की क्षमता देखी गई है। आने वाले वर्षों में इन किस्मों के बीज किसानों तक पहुंचाने के प्रयास किए जाएंगे।
BBF और रेज्ड-बेड तकनीक पर भी जोर
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के उप महानिदेशक डॉ. राजवीर सिंह ने मध्यप्रदेश के चार जिलों में कृषि रोडमैप के तहत किए जा रहे कार्यों की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि किसानों को नई तकनीकों का केवल सैद्धांतिक ज्ञान देना ही नहीं, बल्कि उन्हें खेत स्तर पर अपनाने के लिए व्यवहारिक प्रशिक्षण देना भी आवश्यक है।
राष्ट्रीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान के निदेशक डॉ. के. ए. सिंह ने प्रतिकूल मौसम के दौरान सोयाबीन उत्पादन बनाए रखने के लिए संस्थान द्वारा विकसित और परीक्षण की गई तकनीकों की जानकारी दी। उन्होंने ब्रॉड-बेड-फरो (BBF) पद्धति और रेज्ड-बेड प्लांटिंग के परिणामों का उल्लेख किया और बताया कि इन तकनीकों ने विषम मौसम में फसल उत्पादन बनाए रखने में उपयोगिता दिखाई है।
कार्यक्रम का संचालन संस्थान के डॉ. बी. यू. दुपारे ने किया।
प्राकृतिक खेती से सोयाबीन उत्पादन का प्रायोगिक प्रशिक्षण
इसी अवसर पर संस्थान में मध्य भारत में टिकाऊ सोयाबीन उत्पादन के लिए प्राकृतिक खेती पद्धतियों पर तीन दिवसीय प्रायोगिक प्रशिक्षण भी शुरू किया गया। इसमें 20 किसानों को प्राकृतिक खेती आधारित सोयाबीन उत्पादन की तकनीकों का खेत स्तर पर प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
प्राकृतिक खेती पर अनुसंधान एवं प्रशिक्षण कर रहे संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. राघवेंद्र के मार्गदर्शन में पिछले चार वर्षों से संस्थान के प्रक्षेत्र में प्राकृतिक खेती आधारित सोयाबीन उत्पादन की विभिन्न तकनीकों का प्रदर्शन किया जा रहा है।
प्रशिक्षण में किसानों को प्राकृतिक खेती के माध्यम से सोयाबीन उत्पादन, खरपतवार नियंत्रण, कीट एवं रोग प्रबंधन तथा फसल की समग्र देखभाल की जानकारी दी जा रही है। इसके साथ ही प्राकृतिक खेती में उपयोग किए जाने वाले विभिन्न कृषि आदानों को स्थानीय संसाधनों से तैयार करने और खेत में उनके उचित उपयोग की व्यावहारिक विधियां भी सिखाई जा रही हैं।
संस्थान के इन प्रशिक्षण कार्यक्रमों का उद्देश्य किसानों को ऐसी तकनीकों से जोड़ना है, जिनके माध्यम से बदलते मौसम की चुनौतियों के बीच सोयाबीन उत्पादन को बनाए रखते हुए खेती में उपलब्ध स्थानीय संसाधनों और वैज्ञानिक ज्ञान का बेहतर समन्वय किया जा सके।



