
वरिष्ठजन सम्मान एवं संवाद दिवस पर ‘वर्तमान समय में सनातन धर्म के समक्ष चुनौतियां’ विषय पर विचार मंथन; मंजू सिंह और डॉ. विमल गर्ग सम्मानित
उज्जैन, 29 सितंबर। (SDNA) सनातन धर्म का मूल भाव प्रत्येक प्राणी के प्रति प्रेम, करुणा और कल्याण की भावना में निहित है। यह किसी सीमित वर्ग, जाति या क्षेत्र तक बंधा हुआ विचार नहीं, बल्कि समूची मानवता और प्रकृति के कल्याण की जीवनदृष्टि है। वर्तमान समय में धर्म के नाम पर बढ़ता प्रदर्शन और पाखंड इसकी मूल भावना के सामने गंभीर चुनौती बन रहा है। यह विचार महाश्वेता नगर में आयोजित ‘वर्तमान समय में सनातन धर्म के समक्ष चुनौतियां’ विषयक विचार संगोष्ठी में विद्वानों ने व्यक्त किए।
कार्यक्रम का आयोजन जीवन उद्घोष समिति, उज्जैन द्वारा पूर्व संभाग आयुक्त एवं कुलपति डॉ. मोहन गुप्त के जन्मदिवस के अवसर पर आयोजित वरिष्ठजन सम्मान एवं संवाद दिवस के तहत किया गया। कार्यक्रम में वरिष्ठजनों का सम्मान उनके परिजनों एवं इष्ट-मित्रों द्वारा किया गया।
मंजू सिंह और डॉ. विमल गर्ग को सम्मान
वर्ष 2025-26 के लिए ‘श्रीमती वैजयंती गुप्ता वरिष्ठजन सम्मान’ श्रीमती मंजू सिंह को प्रदान किया गया, जबकि ‘डॉ. अशोक गुप्ता चिकित्सा सेवा सम्मान’ वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. विमल गर्ग को प्रदान किया गया।
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कार्यक्रम में संस्कृत के वरेण्य विद्वान डॉ. राधावल्लभ त्रिपाठी, प्रो. बाल कृष्ण शर्मा, श्री शिव चौरसिया, प्रो. शैलेन्द्र पाराशर, श्री पिलकेंद्र अरोरा और श्री प्रकाश व्यास सहित अनेक विद्वान एवं गणमान्यजन उपस्थित रहे।
सनातन जीवन जीने की कला सिखाता है : डॉ. त्रिपाठी
संगोष्ठी की शुरुआत करते हुए संस्कृत संस्थान दिल्ली के पूर्व कुलपति डॉ. राधावल्लभ त्रिपाठी ने कहा कि सनातन धर्म मानव जाति के अस्तित्व की रक्षा, उसकी उन्नति और जीवन के उच्च उद्देश्य की प्राप्ति का आधार है। उन्होंने कहा कि सनातन केवल धार्मिक अवधारणा नहीं, बल्कि मानव जीवन को दिशा देने वाली व्यापक जीवनदृष्टि है।
इस अवसर पर उज्जयनी विद्वत परिषद के अध्यक्ष डॉ. मोहन गुप्त ने डॉ. राधावल्लभ त्रिपाठी को ‘महापंडित’ की उपाधि से अलंकृत किया।
आचरण में दिखे सनातन, केवल प्रदर्शन तक सीमित न रहे : प्रो. शर्मा
पूर्व कुलपति एवं संस्कृत विद्वान प्रो. बाल कृष्ण शर्मा ने सनातन की अवधारणा की व्याख्या करते हुए कहा कि सनातन का आशय उस विचार से है, जो हर काल और हर स्थान में प्रासंगिक बना रहता है। उन्होंने मनुस्मृति, वाल्मीकि रामायण, महाभारत और श्रीमद्भगवद्गीता के विभिन्न प्रसंगों के माध्यम से सनातन धर्म के मूल सिद्धांतों को सामने रखा।
उन्होंने कहा कि सत्य बोलना, लेकिन प्रिय बोलना; अप्रिय सत्य से बचना और प्रिय असत्य का भी सहारा न लेना सनातन जीवन-मूल्यों का हिस्सा है। राम का पुत्र धर्म का पालन, कृष्ण का सनातन स्वरूप तथा राजा के लिए लोक रक्षा और प्रजा पालन जैसे उदाहरणों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि युधिष्ठिर ने अहिंसा, सत्य, अक्रोध और दान को सनातन धर्म का स्वरूप बताया है।
प्रो. शर्मा ने कहा कि वर्तमान समय में अनेक स्तरों पर सनातन मूल्यों से दूरी दिखाई देती है। उनके अनुसार मोबाइल और तकनीक के अत्यधिक प्रभाव ने भी पारंपरिक जीवन मूल्यों को प्रभावित किया है। उन्होंने कहा कि सनातन को केवल पाखंड और प्रदर्शन से जोड़ने के बजाय आचरण की शुद्धता और मूल तत्वों को जीवन में उतारने की आवश्यकता है।
सनातन किसी सीमा में बंधा विचार नहीं : डॉ. मोहन गुप्त
डॉ. मोहन गुप्त ने कहा कि सनातन धर्म हमारी आधारशिला है। धर्म के नाम पर होने वाला दिखावा और पाखंड उसकी मूल भावना को प्रभावित करता है। उन्होंने कहा कि सनातन किसी एक देश, समाज, जाति या वर्ग तक सीमित नहीं है।
उन्होंने कहा कि जो समूचे विश्व के कल्याण की भावना रखता है और लोगों को जोड़ने का कार्य करता है, वही सनातन की मूल भावना के अनुरूप है। सनातन को किसी सीमा में बांधा नहीं जा सकता, क्योंकि इसकी अवधारणा सर्वकालिक और सर्वव्यापक है।
प्रकृति के सम्मान में भी निहित है सनातन : शिव चौरसिया
डॉ. शैलेन्द्र पाराशर ने कहा कि सनातन संस्कृति में मनुष्य को बेहतर इंसान बनाने पर विशेष जोर दिया गया है। उन्होंने कहा कि स्वार्थपूर्ण उद्देश्यों से सनातन की अलग-अलग व्याख्याएं किए जाने की प्रवृत्ति भी एक चुनौती है।
श्री शिव चौरसिया ने कहा कि सनातन धर्म में केवल मानव ही नहीं, बल्कि जीव-जंतु और पूरी प्रकृति के कल्याण एवं संरक्षण की भावना शामिल है। उन्होंने अपने बचपन का प्रसंग साझा करते हुए बताया कि उनकी मां नदी में कंकड़ तक नहीं फेंकने की सीख देती थीं। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति नदी, पर्वत, पेड़-पौधों सहित प्रकृति के प्रत्येक घटक के प्रति सम्मान का भाव रखती है। सर्वकल्याण और स्वार्थ से परे सेवा की भावना सनातन का महत्वपूर्ण पक्ष है।
‘निवृत्ति से प्रवृत्ति की ओर’ है समिति का ध्येय
जीवन उद्घोष समिति के अध्यक्ष श्री प्रकाश व्यास ने कहा कि सनातन धर्म एक ऐसी जीवनशाला है, जो व्यक्ति को जीवन जीने की कला सिखाती है। उन्होंने बताया कि समिति की स्थापना 2014 में हुई थी और तब से संस्था वरिष्ठजन सेवा तथा गो सेवा के क्षेत्र में निरंतर कार्य कर रही है।
उन्होंने बताया कि समिति का ध्येय वाक्य ‘निवृत्ति से प्रवृत्ति की ओर’ है। समिति की गतिविधियों का उद्देश्य सांसारिक निवृत्ति से आध्यात्मिक प्रगति की दिशा में आगे बढ़ना है। उन्होंने कहा कि समिति के संरक्षक डॉ. मोहन गुप्त ने अपना जन्मदिन वरिष्ठजन सेवा और गो सेवा के लिए समर्पित किया है।
इन वरिष्ठजनों का भी हुआ सम्मान
कार्यक्रम में डॉ. एस. एन. पांडे, प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी, प्रो. विष्णु प्रसाद कचोले, डॉ. चन्दर सोनाने और श्री अनिल कुमार रावत का उनके परिजनों एवं इष्ट-मित्रों द्वारा शॉल और श्रीफल भेंट कर सम्मान किया गया।
कार्यक्रम का शुभारंभ मां सरस्वती, श्रीमती वैजयंती गुप्ता एवं श्री अशोक गुप्ता के चित्रों पर माल्यार्पण एवं पूजन के साथ हुआ। संचालन श्री पिलकेंद्र अरोरा ने किया। स्वागत गीत श्रीमती राधा मित्तल ने प्रस्तुत किया, जबकि आभार श्री प्रकाश व्यास ने माना।
इस अवसर पर डॉ. आर. ए. मुदगल, श्री एस. के. दुबे, श्रीमती संगीता गुप्ता, श्रीमती छाया गुप्ता, श्री उपेन्द्र गुप्ता, श्री पंकज मित्तल सहित अन्य गणमान्यजन उपस्थित रहे।



