Friday, October 9

सोशल मीडिया के दौर में सूचना युद्ध: राष्ट्रीय सुरक्षा के सामने उभरती नई चुनौती

फर्जी खबरों से डीपफेक तक—डिजिटल प्लेटफॉर्म पर फैलने वाली भ्रामक सूचनाएं सामाजिक विश्वास, जनमत और संकट प्रबंधन को प्रभावित कर सकती हैं

(SDNA) विशेष लेख। इंटरनेट और सोशल मीडिया ने सूचना को अभूतपूर्व गति प्रदान की है। फेसबुक, एक्स, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और व्हाट्सऐप जैसे प्लेटफॉर्म के माध्यम से कोई भी सूचना कुछ ही क्षणों में बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंच सकती है। यह सुविधा आधुनिक समाज के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन इसी तेजी ने सूचना युद्ध को भी राष्ट्रीय सुरक्षा की नई चुनौती के रूप में सामने ला दिया है।

सूचना युद्ध का व्यापक अर्थ ऐसी सूचनाओं के रणनीतिक इस्तेमाल से है, जिनके जरिए लोगों की धारणा, भावनाओं, विश्वास और निर्णयों को प्रभावित करने का प्रयास किया जाए। इसमें झूठी खबरें, अधूरी जानकारी, पुराने फोटो-वीडियो को नई घटना से जोड़ना, वास्तविक सूचना को संदर्भ से हटाकर प्रस्तुत करना और किसी खास संदेश को लगातार प्रसारित करना शामिल हो सकता है।

जब सूचना ही बन जाए प्रभाव का हथियार

परंपरागत प्रचार को व्यापक स्तर पर पहुंचाने के लिए अखबार, रेडियो और टेलीविजन जैसे माध्यमों पर निर्भरता अधिक थी। डिजिटल युग ने इस समीकरण को बदल दिया है। आज एक स्मार्टफोन से तैयार किया गया वीडियो कुछ ही समय में हजारों या लाखों लोगों तक पहुंच सकता है।

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समस्या तब बढ़ती है जब लोग किसी सामग्री की सत्यता जांचे बिना उसे आगे साझा करने लगते हैं। एक गलत दावा बार-बार प्रसारित होने पर वास्तविक तथ्य जैसा प्रतीत हो सकता है। इस तरह सूचना की गति कई बार उसकी सत्यता से आगे निकल जाती है।

विविधता वाले समाज में गलत सूचना का असर

भारत की सामाजिक और भाषाई विविधता के कारण संवेदनशील विषयों से जुड़ी भ्रामक सामग्री का प्रभाव व्यापक हो सकता है। किसी स्थानीय घटना को गलत संदर्भ देकर धार्मिक या सामुदायिक मुद्दे के रूप में प्रस्तुत किया जाए तो इससे तनाव और अविश्वास बढ़ने की स्थिति बन सकती है।

किसी व्यक्ति पर झूठा आरोप, किसी समुदाय के बारे में भ्रामक दावा या किसी घटना की पुरानी तस्वीर को वर्तमान घटना बताना भी लोगों की भावनाओं को प्रभावित कर सकता है। ऐसी परिस्थितियों में प्रशासन और पुलिस के सामने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के साथ-साथ सही सूचना तेजी से जनता तक पहुंचाने की चुनौती रहती है।

डीपफेक ने बढ़ाई चुनौती

कृत्रिम बुद्धिमत्ता के विकास के साथ डीपफेक एक महत्वपूर्ण चिंता बनकर सामने आया है। AI तकनीक का इस्तेमाल किसी व्यक्ति के चेहरे, आवाज या हावभाव में बदलाव कर ऐसी सामग्री तैयार करने में किया जा सकता है जो पहली नजर में वास्तविक प्रतीत हो।

यदि किसी नेता, अधिकारी, सैन्यकर्मी या सार्वजनिक व्यक्तित्व के नाम से नकली वीडियो या ऑडियो प्रसारित किया जाए, तो इससे भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है। चुनाव, सैन्य तनाव, आतंकवादी घटनाओं या अन्य बड़े संकटों के दौरान ऐसी सामग्री की संवेदनशीलता और बढ़ जाती है।

सैन्य सूचनाओं के मामले में अतिरिक्त सतर्कता जरूरी

सूचना युद्ध का एक महत्वपूर्ण पहलू सैन्य और सुरक्षा संबंधी जानकारी भी है। किसी अभियान के दौरान सैनिकों की स्थिति, गतिविधियों, हताहतों या सैन्य घटनाओं के संबंध में अपुष्ट दावे फैलाए जा सकते हैं। पुराने युद्ध या सैन्य कार्रवाई के वीडियो को वर्तमान घटना से जोड़ना भी भ्रम पैदा कर सकता है।

ऐसे मामलों में गलत सूचना केवल जनमत को प्रभावित नहीं करती, बल्कि सुरक्षा अभियानों और सैनिकों के मनोबल से जुड़े प्रश्न भी खड़े कर सकती है। इसलिए सुरक्षा संबंधी सामग्री साझा करते समय स्रोत और संदर्भ की जांच विशेष रूप से आवश्यक हो जाती है।

सीमा से परे भी चलती है सूचना की लड़ाई

सूचना युद्ध का प्रभाव घरेलू घटनाओं तक सीमित नहीं है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी डिजिटल प्लेटफॉर्म किसी देश की छवि, नीतियों और घटनाओं को लेकर धारणा निर्माण का माध्यम बन सकते हैं।

सीमा विवाद, आतंकवाद, कश्मीर, आंतरिक अशांति या अन्य संवेदनशील मुद्दों पर लगातार एक विशेष प्रकार की सामग्री प्रसारित किए जाने से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किसी घटना की व्याख्या प्रभावित करने का प्रयास किया जा सकता है। ऐसे मामलों में तथ्य और प्रचार के बीच अंतर करना महत्वपूर्ण हो जाता है।

बॉट और नकली अकाउंट से बन सकती है कृत्रिम लोकप्रियता

सोशल मीडिया पर बॉट, फर्जी अकाउंट और समन्वित नेटवर्क भी सूचना के वातावरण को प्रभावित कर सकते हैं। किसी व्यक्ति को ऐसा लग सकता है कि कोई विचार या संदेश बहुत तेजी से लोकप्रिय हो रहा है, जबकि उसके पीछे बड़ी संख्या में कृत्रिम या एक ही नेटवर्क से संचालित अकाउंट हो सकते हैं।

एक ही संदेश को लगातार अलग-अलग अकाउंट से साझा किए जाने पर उसकी पहुंच वास्तविक जनसमर्थन से अधिक दिखाई दे सकती है। इससे वास्तविक जनमत और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर निर्मित कृत्रिम माहौल के बीच अंतर करना कठिन हो जाता है।

आपदा और संकट के समय गलत सूचना ज्यादा नुकसानदेह

बाढ़, भूकंप, महामारी या अन्य आपात परिस्थितियों में गलत सूचना का प्रभाव और गंभीर हो सकता है। किसी आपदा के दौरान गलत स्थान, राहत केंद्र या स्थिति की जानकारी लोगों को भ्रमित कर सकती है और राहत व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती है।

इसी तरह स्वास्थ्य संबंधी अपुष्ट दावे लोगों के व्यवहार और निर्णयों को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए संकट के समय आधिकारिक और विश्वसनीय सूचना का तेज गति से प्रसार बेहद महत्वपूर्ण है।

तकनीक के साथ संस्थागत तैयारी भी जरूरी

सूचना युद्ध की चुनौती से निपटने के लिए केवल तकनीकी उपकरण पर्याप्त नहीं होंगे। फर्जी खबरों, डीपफेक और समन्वित डिजिटल नेटवर्क की पहचान के लिए आधुनिक तकनीक के साथ प्रशिक्षित विशेषज्ञों की आवश्यकता होगी।

AI आधारित प्रणालियां संदिग्ध सामग्री की पहचान में सहायता कर सकती हैं, लेकिन महत्वपूर्ण मामलों में मानवीय सत्यापन भी जरूरी रहेगा। सरकारी विभागों और संबंधित संस्थाओं के बीच बेहतर समन्वय से संकट की स्थिति में प्रमाणित सूचना जनता तक तेजी से पहुंचाई जा सकती है।

प्लेटफॉर्म कंपनियों की भी जिम्मेदारी

सोशल मीडिया कंपनियों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। फर्जी अकाउंट, समन्वित भ्रामक गतिविधियों और गंभीर रूप से नकली डिजिटल सामग्री की पहचान के लिए प्रभावी प्रणालियां विकसित करना आवश्यक है।

हालांकि गलत सूचना से निपटने की प्रक्रिया में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, नागरिक अधिकारों और पारदर्शिता का संतुलन बनाए रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। डिजिटल सुरक्षा और लोकतांत्रिक अधिकारों के बीच संतुलित दृष्टिकोण इस चुनौती से निपटने की आधारभूत आवश्यकता है।

सबसे बड़ी सुरक्षा दीवार: जागरूक नागरिक

सूचना युद्ध के दौर में आम नागरिक की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। किसी फोटो, वीडियो या संदेश को केवल इसलिए सही नहीं मानना चाहिए क्योंकि वह किसी परिचित व्यक्ति या लोकप्रिय सोशल मीडिया अकाउंट से आया है।

विशेष रूप से धार्मिक, राजनीतिक, सैन्य और सामुदायिक विषयों से संबंधित सामग्री साझा करने से पहले उसके स्रोत, तारीख और संदर्भ की जांच करनी चाहिए। किसी सूचना की सत्यता को लेकर संदेह हो तो उसे आगे प्रसारित न करना एक जिम्मेदार कदम हो सकता है।

डिजिटल साक्षरता को शिक्षा का हिस्सा बनाने की जरूरत

स्कूलों और विश्वविद्यालयों में मीडिया एवं डिजिटल साक्षरता को बढ़ावा देना इस चुनौती से दीर्घकालिक मुकाबले का महत्वपूर्ण माध्यम हो सकता है। विद्यार्थियों को स्रोतों की जांच, फोटो-वीडियो के संदर्भ की पहचान, फर्जी खबरों के संकेत और डिजिटल सामग्री की विश्वसनीयता समझने की बुनियादी जानकारी दी जानी चाहिए।

युवा पीढ़ी डिजिटल माध्यमों की सबसे सक्रिय उपयोगकर्ता है, इसलिए उनमें तथ्य-जांच और जिम्मेदार डिजिटल व्यवहार की क्षमता विकसित करना व्यापक सामाजिक सुरक्षा में योगदान कर सकता है।

राष्ट्रीय सुरक्षा अब सूचना की विश्वसनीयता से भी जुड़ी है

आधुनिक राष्ट्रीय सुरक्षा केवल सीमाओं की रक्षा या सैन्य क्षमता तक सीमित नहीं रह गई है। समाज का विश्वास, सामाजिक एकता और नागरिकों तक विश्वसनीय सूचना की पहुंच भी सुरक्षा के महत्वपूर्ण आयाम बन चुके हैं।

तकनीकी क्षमता, मजबूत साइबर सुरक्षा, विश्वसनीय और त्वरित सरकारी संचार, जिम्मेदार डिजिटल प्लेटफॉर्म तथा जागरूक नागरिक—इन सभी के संयुक्त प्रयास से सूचना युद्ध की चुनौतियों का सामना किया जा सकता है।

सूचना के इस नए युग में चुनौती केवल यह नहीं है कि कौन-सी खबर सबसे पहले पहुंचती है, बल्कि यह भी है कि जो सूचना समाज तक पहुंच रही है, वह कितनी विश्वसनीय, संदर्भपूर्ण और सत्यापित है।

— डॉ. सत्यवान सौरभ
पीएचडी (राजनीति विज्ञान), कवि एवं सामाजिक विचारक