Saturday, October 10

गांधी जयंती विशेष: बदलत्या भारतात गांधी विचारांची नव्याने गरज

सत्य, अहिंसा, स्वावलंबन और सामाजिक उत्तरदायित्व आज भी समाज को दे सकते हैं नई दिशा

लेखक : डॉ. विनायक अशोक जैन लुनिया

(SDNA) नई दिल्ली/उज्जैन। 2 अक्टूबर केवल महात्मा गांधी की जयंती का अवसर नहीं, बल्कि उन मूल्यों को याद करने का दिन है, जिन्होंने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन को व्यापक सामाजिक चेतना से जोड़ा। गांधीजी के लिए आजादी का अर्थ केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं था, बल्कि ऐसा समाज बनाना था, जहां व्यक्ति सम्मान, आत्मनिर्भरता और सामाजिक सद्भाव के साथ जीवन जी सके।

आज देश तकनीक, अर्थव्यवस्था और संचार के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहा है। परिस्थितियां गांधीजी के समय से काफी अलग हैं, लेकिन सत्य, अहिंसा, स्वावलंबन, स्वच्छता और सामाजिक जिम्मेदारी जैसे मूल्यों की प्रासंगिकता पर आज भी विचार किया जा सकता है।

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सत्य और अहिंसा से संवाद की संस्कृति तक

गांधीजी के सार्वजनिक जीवन का आधार सत्य और अहिंसा रहा। उनका मानना था कि अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करते हुए भी मानवीय गरिमा और नैतिकता को बनाए रखा जा सकता है।

आज सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने विचारों के आदान-प्रदान को बेहद तेज कर दिया है। ऐसे समय में असहमति को दुश्मनी में बदलने के बजाय संवाद, संयम और तथ्यों के आधार पर विचार रखने की संस्कृति महत्वपूर्ण हो जाती है।

मतभिन्नता लोकतांत्रिक समाज का स्वाभाविक हिस्सा है। सामने वाले के विचारों को सुनना, असहमति का सम्मान करना और शांतिपूर्ण तरीके से समाधान तलाशना गांधीवादी दृष्टिकोण की आधुनिक अभिव्यक्ति के रूप में देखा जा सकता है।

स्वच्छता केवल अभियान नहीं, नागरिक संस्कार

गांधीजी ने स्वच्छता को केवल व्यक्तिगत आदत नहीं माना, बल्कि इसे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी से जोड़ा। आज देशभर में स्वच्छता को लेकर अनेक अभियान चलाए जा रहे हैं, लेकिन किसी भी अभियान की स्थायी सफलता नागरिकों की रोजमर्रा की आदतों पर निर्भर करती है।

कचरा निर्धारित स्थान पर डालना, सार्वजनिक स्थलों को गंदा न करना, जलस्रोतों की रक्षा करना और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान से बचाना जैसे छोटे कदम सामाजिक जिम्मेदारी की बड़ी मिसाल बन सकते हैं।

चरखे से आत्मनिर्भरता तक

गांधीजी के लिए चरखा स्वावलंबन, श्रम और स्थानीय अर्थव्यवस्था का प्रतीक था। वे स्थानीय उत्पादन और ग्रामीण उद्योगों को आर्थिक मजबूती का आधार मानते थे।

आज भारत में स्टार्टअप, छोटे उद्योग, स्थानीय उद्यम, महिला उद्यमिता और ग्रामीण व्यवसाय नए अवसर पैदा कर रहे हैं। ऐसे में स्वदेशी और आत्मनिर्भरता की मूल भावना को आधुनिक अर्थव्यवस्था के संदर्भ में समझा जा सकता है।

स्थानीय उत्पादों और छोटे कारोबारों को बढ़ावा मिलने से रोजगार के अवसरों के साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिल सकती है।

डिजिटल दौर में गांधी विचारों की नई परीक्षा

आज की युवा पीढ़ी के पास सूचना और तकनीक की अभूतपूर्व शक्ति है। एक संदेश कुछ ही क्षणों में हजारों लोगों तक पहुंच सकता है। लेकिन इसी तेजी के साथ गलत सूचना, अफवाह और आक्रामक संवाद का खतरा भी बढ़ा है।

ऐसे वातावरण में गांधीजी का सत्य पर जोर नई प्रासंगिकता प्राप्त करता है। किसी सूचना को आगे बढ़ाने से पहले उसकी पुष्टि करना, अपमानजनक भाषा से बचना, वैचारिक असहमति में भी मर्यादा बनाए रखना और डिजिटल माध्यमों का उपयोग समाजहित में करना जिम्मेदार नागरिकता के महत्वपूर्ण उदाहरण हो सकते हैं।

गांधी जयंती का संदेश समारोह से आगे

गांधी जयंती को केवल माल्यार्पण, भाषण और औपचारिक कार्यक्रमों तक सीमित रखने के बजाय इसे आत्ममंथन का अवसर बनाया जा सकता है।

इस दिन कोई व्यक्ति अपने आसपास स्वच्छता बनाए रखने, जरूरतमंद की सहायता करने, स्थानीय उत्पाद को प्राथमिकता देने, संवाद में संयम रखने या बिना सत्यापन के कोई जानकारी साझा न करने का संकल्प ले सकता है।

सामाजिक परिवर्तन हमेशा बड़े आंदोलनों से ही शुरू हो, यह जरूरी नहीं। समाज के करोड़ों नागरिकों की छोटी-छोटी जिम्मेदारियां मिलकर व्यापक परिवर्तन का आधार बन सकती हैं।

समय बदला, लेकिन मूल्यों की जरूरत कायम

तकनीक और जीवनशैली बदल सकती है, लेकिन समाज को सत्य, मानवीय संवेदना, सामाजिक सौहार्द, श्रम के सम्मान और जिम्मेदारी जैसे मूल्यों की आवश्यकता बनी रहती है।

गांधीजी के विचारों को केवल इतिहास के पन्नों तक सीमित करने के बजाय उनके मूल संदेश को वर्तमान परिस्थितियों में समझना अधिक महत्वपूर्ण है। सत्य, अहिंसा, स्वच्छता, स्वावलंबन और कमजोर वर्गों के प्रति संवेदनशीलता ऐसे मूल्य हैं, जिनका संबंध किसी एक युग से नहीं है।

इस गांधी जयंती पर सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही हो सकता है—देश और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी को हम अपने दैनिक जीवन में किस तरह बेहतर ढंग से निभा सकते हैं?

इसका उत्तर किसी बड़े मंच पर नहीं, बल्कि हमारी रोजमर्रा की छोटी-छोटी जिम्मेदारियों और व्यवहार में छिपा है। गांधीजी को सच्ची श्रद्धांजलि भी शायद यही होगी कि उनके मूल्यों को स्मृति से निकालकर व्यवहार का हिस्सा बनाया जाए।

— डॉ. विनायक अशोक जैन लुनिया
प्रधान संपादक, SD News Agency
ज्येष्ठ पत्रकार | सामाजिक विषयों के चिंतक एवं भाष्यकार | समाजसेवी | उद्यमी