
कभी बंगाल की राजनीति में दबदबा रखने वाली TMC अब अंदरूनी बगावत, पार्टी के नाम-चिह्न विवाद और सत्ता परिवर्तन के बाद अस्तित्व की नई चुनौती से जूझ रही है
कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में 2026 का घटनाक्रम तृणमूल कांग्रेस (TMC) के लिए एक बड़े राजनीतिक मोड़ के रूप में सामने आया है। लंबे समय तक राज्य की सत्ता पर प्रभाव रखने वाली ममता बनर्जी की पार्टी अब विधानसभा चुनाव में सत्ता गंवाने के बाद गंभीर आंतरिक संकट का सामना कर रही है। चुनावी हार के बाद पार्टी के भीतर विद्रोह तेज हुआ और बड़ी संख्या में विधायकों तथा सांसदों के एक धड़े ने ममता बनर्जी के नेतृत्व को चुनौती दी।
मामला अब केवल नेतृत्व की लड़ाई तक सीमित नहीं है। TMC के नाम और पारंपरिक ‘Flowers and Grass’ चुनाव चिह्न पर भी दोनों गुटों के बीच विवाद चुनाव आयोग तक पहुंच चुका है। चुनाव आयोग ने आगामी उपचुनावों के लिए दोनों गुटों को फिलहाल पुराने नाम और चिह्न के इस्तेमाल से रोक दिया तथा अलग-अलग नाम और चुनाव चिह्न आवंटित किए हैं। ममता खेमे को ‘Mamata All India Trinamool Congress’ नाम और ‘football player’ चुनाव चिह्न, जबकि बागी खेमे को ‘Democratic Trinamool Congress’ नाम और ‘envelope’ चुनाव चिह्न दिया गया है।
सत्ता जाने के बाद शुरू हुई असली लड़ाई
2026 के विधानसभा चुनाव के बाद TMC की मुश्किलें केवल विपक्ष में बैठने तक सीमित नहीं रहीं। चुनावी पराजय के बाद पार्टी के भीतर नेतृत्व और संगठन को लेकर असंतोष खुलकर सामने आया।
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रिपोर्टों के अनुसार जून में लगभग 60 TMC विधायकों के एक समूह ने बगावत का रास्ता अपनाया और रितब्रत बनर्जी को विधानसभा में विपक्ष का नेता बनाने का दावा किया। इसके बाद बागी धड़े ने एक समानांतर संगठनात्मक ढांचा खड़ा करने की कोशिश की और वरिष्ठ विधायक अरूप रॉय को पार्टी का अध्यक्ष घोषित किया। हालांकि ममता समर्थक गुट ने इस कदम की वैधता को चुनौती दी और पार्टी संविधान का हवाला देते हुए ममता बनर्जी को ही पार्टी की अध्यक्ष बताया।
इसके बाद पार्टी के भीतर संघर्ष और गहरा गया।
अब लड़ाई केवल कुर्सी की नहीं, ‘TMC’ की पहचान की भी
TMC संकट का सबसे महत्वपूर्ण पहलू पार्टी के चुनाव चिह्न और नाम को लेकर शुरू हुई कानूनी एवं संस्थागत लड़ाई है।
‘Flowers and Grass’ चिह्न TMC की राजनीतिक पहचान का लंबे समय से हिस्सा रहा है। लेकिन दोनों गुटों के दावों के बीच चुनाव आयोग ने फिलहाल इस नाम और चिह्न को फ्रीज कर दिया।
सितंबर में आयोग ने दोनों गुटों को आगामी उपचुनाव के लिए अलग-अलग नाम और स्वतंत्र चुनाव चिह्न दिए। इसका अर्थ यह है कि फिलहाल दोनों पक्ष पुराने TMC नाम और पारंपरिक चिह्न के साथ चुनाव मैदान में नहीं उतर सकते।
यहीं से बंगाल की राजनीति में एक बड़ा सवाल पैदा होता है—
अगर पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न ही विवाद में हो, तो संगठन की जमीनी पहचान किसके साथ जाएगी?
ममता के सामने ‘घर वापसी’ की चुनौती
ममता बनर्जी के सामने अब सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौतियों में से एक अपने पुराने संगठन को फिर से एकजुट करना है।
बागी नेताओं और विधायकों को वापस साथ लाने की कोशिश केवल संख्या बढ़ाने का प्रयास नहीं होगी। यह संगठनात्मक नियंत्रण, पार्टी की राजनीतिक पहचान और भविष्य के नेतृत्व की दिशा से भी जुड़ा हुआ है।
ममता के लिए चुनौती यह भी है कि पार्टी के भीतर असंतोष के अलग-अलग कारणों को कैसे संबोधित किया जाए। बगावत में केवल एक नेता या एक मुद्दे का सवाल नहीं दिखता, बल्कि नेतृत्व, संगठन और भविष्य की राजनीतिक दिशा को लेकर कई स्तरों पर टकराव सामने आया है।
इसीलिए यदि ममता बनर्जी बागी नेताओं के लिए वापसी का रास्ता खोलती हैं, तो यह उनके लिए एक साथ संगठन बचाने और नेतृत्व की स्वीकार्यता बनाए रखने की परीक्षा होगी।
भाजपा की सरकार बनने के बाद बदला राजनीतिक समीकरण
2026 के विधानसभा चुनाव के बाद पश्चिम बंगाल की सत्ता का समीकरण भी बदल गया। भाजपा के नेतृत्व में राज्य में सरकार बनने के बाद TMC पहली बार एक अलग राजनीतिक परिस्थिति में पहुंची है।
ममता बनर्जी ने चुनाव परिणामों और चुनाव प्रक्रिया को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने भाजपा और चुनाव प्रक्रिया से जुड़े संस्थानों पर चुनाव में अनियमितताओं के आरोप लगाए और दावा किया कि बड़ी संख्या में सीटों पर गड़बड़ी के कारण TMC को नुकसान हुआ।
इन आरोपों का भाजपा और चुनाव प्रक्रिया से जुड़े पक्षों द्वारा अलग दृष्टिकोण से जवाब दिया गया है। इसलिए इन दावों को स्थापित तथ्य के बजाय राजनीतिक आरोप और विवादित दावे के रूप में देखना जरूरी है।
‘वोट चोरी’ का मुद्दा भी राजनीतिक बहस के केंद्र में
पश्चिम बंगाल चुनाव के बाद विपक्षी राजनीति में चुनावी प्रक्रिया और मतदाता सूची को लेकर भी सवाल उठे हैं।
राहुल गांधी सहित विपक्ष के नेताओं ने 2026 के विधानसभा चुनावों में कथित चुनावी अनियमितताओं के आरोप लगाए और चुनाव परिणामों को लेकर सवाल उठाए।
दूसरी ओर, ममता बनर्जी ने भी चुनाव प्रक्रिया को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं। हालिया बयानों में उन्होंने मतदाता सूची से बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने और चुनाव प्रक्रिया में सॉफ्टवेयर के माध्यम से कथित हेरफेर जैसे आरोप लगाए हैं। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि और उनके कानूनी निष्कर्ष अलग विषय हैं।
इसलिए बंगाल की मौजूदा राजनीतिक तस्वीर को समझने के लिए दो चीजों को अलग-अलग देखना होगा—
एक, TMC की अंदरूनी संगठनात्मक लड़ाई।
दूसरा, चुनाव प्रक्रिया को लेकर लगाए जा रहे राजनीतिक आरोप।
दोनों को एक ही तथ्य मान लेना राजनीतिक विश्लेषण को कमजोर कर सकता है।
क्या ममता फिर से TMC को एकजुट कर पाएंगी?
यही अब बंगाल की राजनीति का बड़ा सवाल है।
ममता बनर्जी के सामने एक तरफ बागी नेताओं को वापस लाने की चुनौती है, तो दूसरी तरफ पार्टी के संगठन को जमीनी स्तर पर सक्रिय रखने की जिम्मेदारी है।
इसके साथ ही चुनाव आयोग के सामने चल रहा नाम और चुनाव चिह्न का विवाद भी पार्टी की भविष्य की पहचान को प्रभावित कर सकता है। जुलाई में ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग से TMC के नाम और नियंत्रण को लेकर चल रही कार्यवाही को जल्द समाप्त करने की मांग भी की थी।
इसका मतलब साफ है कि TMC की लड़ाई अब केवल विधानसभा की सीटों तक सीमित नहीं है। यह पार्टी संगठन, नेतृत्व, नाम, चुनाव चिह्न और राजनीतिक विरासत—इन सभी स्तरों पर चल रही है।
बंगाल की राजनीति में आगे क्या?
आने वाले समय में कम से कम चार सवाल महत्वपूर्ण रहेंगे:
पहला— क्या बागी विधायक और सांसद फिर ममता बनर्जी के साथ लौटेंगे?
दूसरा— TMC के नाम और पारंपरिक चुनाव चिह्न पर चुनाव आयोग का अंतिम फैसला किस दिशा में जाता है?
तीसरा— विपक्ष के चुनावी अनियमितताओं और ‘वोट चोरी’ के आरोपों का राजनीतिक तथा कानूनी स्तर पर क्या असर पड़ता है?
चौथा— सत्ता से बाहर होने के बाद ममता बनर्जी TMC के संगठन और जनाधार को किस तरह पुनर्गठित करती हैं?
निष्कर्ष
पश्चिम बंगाल में TMC के सामने इस समय चुनौती केवल चुनाव हारने की नहीं है। पार्टी को आंतरिक विद्रोह, नेतृत्व विवाद, संगठनात्मक बिखराव और चुनाव चिह्न की लड़ाई जैसी कई समानांतर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
ममता बनर्जी के लिए अब अगला राजनीतिक अध्याय इस बात पर निर्भर करेगा कि वह पार्टी के भीतर पैदा हुए मतभेदों को किस तरह संभालती हैं और अपने संगठन को किस तरह पुनर्गठित करती हैं।
वहीं भाजपा के सत्ता में आने के बाद बंगाल की राजनीति में विपक्ष की भूमिका भी नए सिरे से परिभाषित हो रही है।
ऐसे में फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है—
क्या ममता बनर्जी बिखरे हुए संगठन को फिर एकजुट कर पाएंगी, या TMC का मौजूदा संकट बंगाल की राजनीति में एक नए दौर की शुरुआत करेगा?
(SDNA)



