Friday, October 9

जेन-जी को एक नजर से देखना सही नहीं, भारत की विविधता में युवाओं की प्राथमिकताएं भी अलग : चैतन्य कश्यप

एआई और सोशल मीडिया के दौर में पत्रकारिता के सामने विश्वसनीयता की नई चुनौती; युवाओं से संवाद नहीं हुआ तो दिशाहीन होने का खतरा

इंदौर | SDNA

भारत की विविधता केवल भाषा, संस्कृति और भौगोलिक परिस्थितियों तक सीमित नहीं है, बल्कि देश की नई पीढ़ी की सोच और प्राथमिकताओं में भी दिखाई देती है। जेन-जी को पूरे देश में एक समान मानसिकता वाला वर्ग मानना उचित नहीं होगा। महानगरों से लेकर छोटे शहरों और अलग-अलग राज्यों तक युवाओं के सपने, चुनौतियां और प्राथमिकताएं अलग-अलग हो सकती हैं।

यह बात मध्यप्रदेश के एमएसएमई मंत्री चैतन्य कश्यप ने इंदौर में स्टेट प्रेस क्लब मध्यप्रदेश द्वारा आयोजित तीन दिवसीय भारतीय पत्रकारिता महोत्सव में कही। उन्होंने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सोशल मीडिया के विस्तार ने पत्रकारिता के सामने चुनौती का स्वरूप बदल दिया है। अब पत्रकारिता के सामने केवल सूचना देने की चुनौती नहीं, बल्कि विश्वसनीय सूचना और तथ्य के आधार पर जनविश्वास कायम रखने की चुनौती भी है।

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भारत की जेन-जी, एक जैसी नहीं

कश्यप ने कहा कि भारत में जेन-जी को एक ही नजरिए से नहीं देखा जा सकता। मुंबई, दिल्ली, इंदौर, उत्तर प्रदेश और देश के अन्य हिस्सों में रहने वाले युवाओं की परिस्थितियां अलग हैं और इसलिए उनकी प्राथमिकताएं भी अलग हो सकती हैं।

उन्होंने कहा कि यह उम्र सपने देखने और उन्हें साकार करने की दिशा में आगे बढ़ने की है। इसलिए युवाओं को केवल राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनाने के बजाय उनके साथ निरंतर संवाद स्थापित करना जरूरी है।

उनके अनुसार यदि नई पीढ़ी से संवाद का माध्यम कमजोर हुआ तो युवाओं की ऊर्जा सही दिशा में जाने के बजाय भ्रमित भी हो सकती है।

एआई ने बदल दिया पत्रकारिता के सामने चुनौती का स्वरूप

मंत्री ने कहा कि पत्रकारिता पहले भी बदलावों से गुजरती रही है। अखबारों में जिला संस्करण और अलग-अलग क्षेत्रों के लिए पेज तैयार करने की परंपरा ने स्थानीय पत्रकारिता को विस्तार दिया। सोशल मीडिया के आने के बाद सूचना की गति कई गुना बढ़ गई और अब एआई ने इस चुनौती को एक नए स्तर पर पहुंचा दिया है।

एआई के दौर में बड़ी मात्रा में सामग्री कुछ ही समय में तैयार की जा सकती है। ऐसे माहौल में पत्रकारिता की वास्तविक ताकत केवल तेजी नहीं, बल्कि सत्यापन, संदर्भ, प्रामाणिकता और संपादकीय जिम्मेदारी होगी।

कश्यप ने कहा कि पत्रकारिता के सामने आज सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक माध्यम के प्रति भरोसा कायम करना है। समाज में विश्वसनीयता का संकट दिखाई दे रहा है और पत्रकारिता की सामग्री की प्रामाणिकता पर भी सवाल उठ रहे हैं।

सूचना देना ही पर्याप्त नहीं, भरोसा कायम करना जरूरी

कश्यप के वक्तव्य का महत्वपूर्ण पक्ष पत्रकारिता की बदलती भूमिका से जुड़ा रहा। उनके अनुसार पत्रकारिता को केवल सूचना पहुंचाने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। आज सूचना के साथ सही संदर्भ देना और जिम्मेदार तरीके से विमर्श तैयार करना भी बड़ी चुनौती है।

सोशल मीडिया पर एक ही घटना से जुड़ी अनेक तरह की सूचनाएं कुछ मिनटों में सामने आ जाती हैं। ऐसे में पाठक या दर्शक के सामने सबसे बड़ा सवाल यह होता है कि किस सूचना पर भरोसा किया जाए।

यही वह जगह है जहां पेशेवर पत्रकारिता की भूमिका और बढ़ जाती है।

इंदौर से ही क्यों संभव है ऐसा महोत्सव?

कश्यप ने कहा कि पत्रकारिता महोत्सव जैसे आयोजन इंदौर की धरती से ही संभव हैं। उन्होंने इंदौर और उज्जैन को उत्सवों और सांस्कृतिक गतिविधियों की नगरी बताते हुए पत्रकारिता से जुड़े लोगों के लिए ऐसे आयोजनों को महत्वपूर्ण बताया।

उन्होंने ‘शिव गंगा अभियान’ को भी पत्रकारिता के क्षेत्र से जुड़े लोगों के लिए अध्ययन का विषय बताया।

हिंदी पत्रकारिता के विकास में राजेंद्र माथुर के योगदान को याद करते हुए उन्होंने कहा कि उन्होंने हिंदी पत्रकारिता को नई ऊंचाई देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

युवाओं से संवाद नहीं हुआ तो बढ़ेगा जोखिम

कश्यप ने कहा कि पत्रकारिता के बदलते आयामों में युवाओं को जोड़ना आवश्यक है। यदि इस वर्ग के साथ संवाद स्थापित नहीं किया गया तो एक बड़ी पीढ़ी विचार और सूचना के स्तर पर दिशाहीन हो सकती है।

उन्होंने कहा कि युवाओं को देश की वास्तविक स्थिति, उसकी जरूरतों और भविष्य की संभावनाओं से परिचित कराना जरूरी है।

नेपाल और बांग्लादेश में युवाओं की भूमिका से जुड़े हालिया घटनाक्रमों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि युवा ऊर्जा जब बड़े स्तर पर संगठित होती है तो राजनीतिक परिस्थितियों को प्रभावित करने की क्षमता रखती है। इसलिए युवाओं को समझना और उनसे संवाद करना किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है।

ग्लोबल स्किल पार्क से युवाओं को नए अवसर

एमएसएमई मंत्री ने प्रदेश में युवाओं और उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए किए जा रहे प्रयासों की जानकारी भी दी। उन्होंने कहा कि भोपाल में ग्लोबल स्किल पार्क स्थापित किया जा रहा है, जिससे युवाओं को कौशल विकास और रोजगार के नए अवसर मिल सकेंगे।

उन्होंने बताया कि मध्यप्रदेश में करीब 7,500 स्टार्टअप पंजीकृत हैं। नए स्टार्टअप को शुरुआती दौर में सहायता देने के लिए सरकार ने ₹10,000 प्रतिमाह की सहायता शुरू की है।

कश्यप के अनुसार अक्सर परिवार और समाज किसी नए विचार या प्रयोग को शुरुआती दौर में स्वीकार नहीं करते। ऐसे समय में सरकारी आर्थिक सहयोग युवा उद्यमियों को अपने विचार पर काम करने और उसे व्यवसाय में बदलने का अवसर दे सकता है।

2047 का भारत केवल आर्थिक रूप से विकसित नहीं होना चाहिए

कश्यप ने कहा कि 2047 का भारत केवल आर्थिक रूप से विकसित देश बनना पर्याप्त नहीं है। विकास का अर्थ सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से विकसित भारत भी होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि आने वाला भारत अवसरों से भरा होगा और युवाओं को इन अवसरों के लिए तैयार करना होगा। इसके लिए शिक्षा, कौशल, उद्यमिता और सही सूचना तक पहुंच महत्वपूर्ण होगी।

उन्होंने यह भी कहा कि राजनीतिक दल आज युवाओं के बीच उस स्तर पर नहीं पहुंच पा रहे हैं, जिस स्तर पर उन्हें पहुंचना चाहिए।

खबर के पीछे का अर्थ : एआई के दौर में पत्रकारिता की असली पूंजी ‘विश्वास’

चैतन्य कश्यप के वक्तव्य का सबसे महत्वपूर्ण संकेत यह है कि एआई पत्रकारिता को खत्म करने से ज्यादा पत्रकारिता के मानकों को बदलने की चुनौती पैदा कर रहा है।

जब मशीनें तेजी से खबरों का प्रारूप तैयार कर सकती हैं, सोशल मीडिया कुछ सेकंड में सूचना फैला सकता है और हर व्यक्ति स्वयं एक संभावित कंटेंट क्रिएटर बन सकता है, तब पत्रकार की भूमिका केवल सूचना लिखने वाले व्यक्ति की नहीं रह जाती।

भविष्य की पत्रकारिता में सबसे मूल्यवान चीज संभवतः विश्वसनीयता होगी।

यानी कौन-सी सूचना सही है, उसका स्रोत क्या है, उसके पीछे का संदर्भ क्या है और उसमें तथ्य तथा राय के बीच अंतर कितना स्पष्ट है—इन सवालों के जवाब देने वाला मीडिया ही लंबे समय तक पाठकों का भरोसा बनाए रख सकेगा।

आने वाले समय का बड़ा सवाल : युवा किसके एजेंडे पर चलेंगे?

जेन-जी के संदर्भ में भी यही बदलाव महत्वपूर्ण है। युवा एक बड़ा सामाजिक समूह जरूर हैं, लेकिन उनकी जरूरतें पूरे देश में एक जैसी नहीं हैं। रोजगार, शिक्षा, स्टार्टअप, तकनीक, स्थानीय अवसर, सामाजिक पहचान और भविष्य की सुरक्षा जैसे मुद्दों की प्राथमिकता स्थान और परिस्थिति के अनुसार बदल सकती है।

इसलिए राजनीतिक दलों, सरकार और मीडिया के लिए चुनौती केवल युवाओं तक पहुंचने की नहीं, बल्कि अलग-अलग क्षेत्रों के युवाओं को समझने की होगी।

यदि 2047 के भारत को वास्तव में अवसरों से भरा भारत बनाना है, तो युवा केवल योजनाओं के लाभार्थी नहीं, बल्कि नीति निर्माण और सामाजिक परिवर्तन के सक्रिय भागीदार बनने होंगे।

और पत्रकारिता के लिए चुनौती इससे भी बड़ी है—युवा जिस तेजी से बदल रहे हैं, क्या पत्रकारिता उतनी ही तेजी से स्वयं को बदलकर उनके भरोसे की कसौटी पर खरी उतर पाएगी?

(SDNA)