
भारतीय पत्रकारिता महोत्सव में राजनीतिक बदलाव पर मंथन; पत्रकारों ने कहा—अब मुद्दे ऊपर से नहीं, जनता और युवाओं के बीच से तय होने लगे हैं, संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका पर भी उठे सवाल
इंदौर | SDNA
भारतीय राजनीति अब केवल पारंपरिक विचारधाराओं, दलों और चुनावी समीकरणों से संचालित नहीं हो रही है। सोशल मीडिया, जेन-जी की राजनीतिक सक्रियता, युवाओं के मुद्दे और संस्थाओं को लेकर बढ़ती सार्वजनिक बहस ने राजनीति की दिशा और भाषा दोनों को प्रभावित करना शुरू कर दिया है। भारतीय पत्रकारिता महोत्सव के दूसरे दिन के पहले सत्र में देशभर से आए वरिष्ठ पत्रकारों ने इसी बदलते राजनीतिक परिदृश्य पर विस्तार से विचार-मंथन किया।
वक्ताओं ने अलग-अलग उदाहरणों के माध्यम से कहा कि आने वाले समय में युवा केवल राजनीतिक दलों के वोट बैंक नहीं होंगे, बल्कि नीतियों, चुनावी एजेंडे और राजनीतिक विमर्श को प्रभावित करने वाली ताकत बन सकते हैं।
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जेन-जी की राजनीति : वोटर से आगे ‘किंगमेकर’ की भूमिका
जयपुर के पत्रकार मुकेश मीणा ने कहा कि जिस तरह जलवायु परिवर्तन ने दुनिया के सामने नई चुनौतियां खड़ी की हैं, उसी तरह राजनीति में भी बदलाव की एक नई प्रक्रिया दिखाई दे रही है। राष्ट्रीय राजनीति से लेकर क्षेत्रीय राजनीति तक इसके संकेत दिखाई दे रहे हैं।
उन्होंने कहा कि जेन-जी का उभरता राजनीतिक व्यवहार एक नई विचारधारा का संकेत है। युवाओं से जुड़े मुद्दों और आंदोलनों ने सरकारों तथा मीडिया दोनों को अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर किया है।
उन्होंने राजनीतिक दलों में बढ़ते दल-बदल और बदलते चुनावी समीकरणों का उल्लेख करते हुए कहा कि राजनीतिक विचारधारा और सत्ता की राजनीति के बीच बढ़ता अंतर जनता के लिए चेतावनी का संकेत हो सकता है।
राजस्थान के स्थानीय निकाय चुनावों के आंकड़ों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भाजपा और कांग्रेस के बीच वोट प्रतिशत का अंतर बहुत अधिक नहीं रहा, जबकि एक बड़ा हिस्सा निर्दलीय प्रत्याशियों की ओर गया। उनके अनुसार यह संकेत है कि मतदाता पारंपरिक राजनीतिक विकल्पों से बाहर भी अपनी पसंद तलाश रहा है।
मुकेश मीणा ने कहा कि आने वाले समय में जेन-जी चुनावी राजनीति का किंगमेकर समूह बन सकता है और राजनीतिक दलों को इस वर्ग के मुद्दों को नजरअंदाज करना मुश्किल होगा।
युवाओं को राजनीति से दूर नहीं, नेतृत्व के केंद्र में लाना होगा
वरिष्ठ पत्रकार डॉ. प्रदीप राव ने युवाओं को संदेश देते हुए कहा कि राजनीति में जोश जरूरी है, लेकिन उसके साथ विवेक भी होना चाहिए। उन्होंने कहा कि खेल, इंजीनियरिंग, शिक्षा और तकनीक सहित अनेक क्षेत्रों में युवाओं को अवसर मिल रहे हैं, लेकिन राजनीतिक नेतृत्व में उनकी भागीदारी अपेक्षाकृत सीमित दिखाई देती है।
उन्होंने राजनीति में अधिक संख्या में युवाओं को आगे लाने की जरूरत बताई और छात्र संघ चुनावों को पुनः शुरू करने के लिए युवाओं को लोकतांत्रिक तरीके से आवाज उठाने की अपील की।
डॉ. राव ने कहा कि छात्र राजनीति से नेतृत्व की पहली सीढ़ी तैयार होती थी। विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में राजनीतिक संवाद के अवसर कम होने से युवा नेतृत्व के विकास की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
उन्होंने अपने वक्तव्य में आंदोलनों के उदाहरण देते हुए कहा कि केवल आंदोलन कर देना पर्याप्त नहीं है; आंदोलन के बाद उसके उद्देश्यों और संस्थागत परिणामों को हासिल करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
संविधान और संवैधानिक संस्थाओं को लेकर चिंता
वरिष्ठ पत्रकार रविंद्र सिंह श्योरण ने राजनीतिक बदलाव के साथ संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि राजनीतिक दल अपने हितों के लिए समय-समय पर समझौते करते रहे हैं, लेकिन लोकतंत्र की मजबूती का आधार संविधान और उसकी संस्थाएं हैं।
उन्होंने कहा कि आज संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता को लेकर सार्वजनिक विमर्श बढ़ रहा है। उनके अनुसार चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं को स्वतंत्र और निष्पक्ष बनाए रखना लोकतंत्र के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
श्योरण ने कहा कि वोट देने का अधिकार लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियादी शक्ति है। यदि नागरिक अपने मताधिकार को प्रभावी ढंग से इस्तेमाल नहीं कर पाता, तो दूसरे लोकतांत्रिक अधिकारों की प्रभावशीलता भी प्रभावित हो सकती है।
उन्होंने सरकार और विद्यार्थियों के बीच संवाद की कमी को भी आंदोलनों के पीछे एक महत्वपूर्ण कारण बताया।
बांग्लादेश और नेपाल के उदाहरणों से भारत के लिए सबक
लखनऊ के डॉ. उत्कर्ष सिन्हा ने बांग्लादेश और नेपाल में युवाओं से जुड़े आंदोलनों का उदाहरण देते हुए कहा कि आज सोशल मीडिया के दौर में किसी मुद्दे के व्यापक जनआंदोलन में बदलने की गति पहले की तुलना में काफी तेज हो गई है।
उन्होंने कहा कि बांग्लादेश में युवाओं का आक्रोश कोटा व्यवस्था से जुड़े मुद्दे से सामने आया, जबकि नेपाल में सोशल मीडिया प्रतिबंधों को लेकर युवाओं की नाराजगी ने राजनीतिक परिस्थितियों को प्रभावित किया।
भारत के संदर्भ में उन्होंने कहा कि युवाओं से जुड़े मुद्दों को लंबे समय तक नजरअंदाज करना राजनीतिक दलों के लिए चुनौती बन सकता है।
उनके अनुसार राजनीति की शैली भी बदल रही है। मेनिफेस्टो आधारित राजनीति से मीम्स और सोशल मीडिया आधारित राजनीतिक संवाद की ओर बढ़ता बदलाव इस बात का संकेत है कि राजनीतिक संदेश अब केवल मंचों और सभाओं से तय नहीं होते।
डॉ. सिन्हा ने कहा कि पहले राजनीतिक दल जनता को एजेंडा देते थे, लेकिन अब कई मुद्दे जनता के बीच से उठकर राजनीतिक दलों के एजेंडे का हिस्सा बनने लगे हैं।
उन्होंने पत्रकारों को भी चेताया कि यदि मीडिया और पत्रकारिता बदलते सामाजिक-राजनीतिक व्यवहार को समझने में पीछे रह गए तो उनकी प्रासंगिकता प्रभावित हो सकती है।
दुनिया की गति समझने की जरूरत
वरिष्ठ पत्रकार दिनेश के. बोहरा ने कहा कि भारत को बदलती दुनिया के साथ अपनी गति तेज करनी होगी। उन्होंने कहा कि आज कछुए की चाल से आगे बढ़ने का समय नहीं है। वैश्विक आर्थिक, तकनीकी और राजनीतिक बदलावों को गंभीरता से समझना आवश्यक है।
उन्होंने विशेष रूप से इस बात पर चिंता जताई कि कई बार व्यावसायिक नेतृत्व राजनीतिक नेतृत्व की दिशा तय करने की स्थिति में दिखाई देता है।
बोहरा ने युवाओं से भविष्य की आवश्यकताओं को पहचानकर स्वयं को तैयार करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि झूठ और मक्कारी का बढ़ता प्रभाव समाज को भीतर से कमजोर कर सकता है।
उन्होंने चीन के करीब तीन दशक पुराने आर्थिक फैसलों का उदाहरण देते हुए बताया कि दूरगामी नीतिगत निर्णयों का असर वर्षों बाद वैश्विक व्यापार और शक्ति संतुलन पर दिखाई दे सकता है।
पत्रकारिता के सामने भी बदलते समय की चुनौती
पूरे सत्र का एक महत्वपूर्ण संदेश यह रहा कि राजनीति बदल रही है तो पत्रकारिता भी पुराने ढर्रे पर नहीं चल सकती।
युवा अब केवल समाचार के उपभोक्ता नहीं हैं। वे स्वयं वीडियो, पोस्ट, मीम्स और सोशल मीडिया के माध्यम से राजनीतिक विमर्श तैयार कर रहे हैं। ऐसे में पत्रकारिता के सामने चुनौती केवल खबर पहुंचाने की नहीं, बल्कि तथ्य, संदर्भ और सत्यापन के साथ तेजी से बदलते जनमत को समझने की भी है।
कार्यक्रम में पिंपरी चिंचवाड़ यूनिवर्सिटी के डॉ. गिरीश देसाई ने आयोजन के लिए शुभकामनाएं दीं। उन्होंने स्टेट प्रेस क्लब मध्यप्रदेश की टीम को प्रतीक चिह्न भी भेंट किया।
देवप्रिय अवस्थी को लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड
भारतीय पत्रकारिता महोत्सव के दूसरे दिन पत्रकारिता के क्षेत्र में दीर्घकालीन योगदान के लिए वरिष्ठ पत्रकार एवं संपादक देवप्रिय अवस्थी को लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित किया गया।
स्टेट प्रेस क्लब मध्यप्रदेश, इंदौर के अध्यक्ष प्रवीण खारीवाल ने उन्हें यह सम्मान प्रदान किया। सम्मान के दौरान सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।
देवप्रिय अवस्थी का पत्रकारिता जीवन लंबे अनुभव, संघर्ष और निरंतर सक्रियता से जुड़ा रहा है। सम्मान समारोह ने पत्रकारिता के क्षेत्र में वर्षों तक काम करने वाले वरिष्ठ पत्रकारों के योगदान को रेखांकित किया।
11 पत्रकारों को सप्तऋषि राष्ट्रीय पत्रकारिता सम्मान
लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड के बाद प्रदेश के 11 श्रेष्ठ पत्रकारों को सप्तऋषि राष्ट्रीय पत्रकारिता सम्मान प्रदान किया गया।
सम्मान पाने वालों में हार्दिक विकास दवे, तेजश्री पुरंदरे, पंकज वानखेड़े, शुभम गौतम, प्रीता उपाध्याय, शिखा शर्मा, वैभव पलनीटकर, डॉ. कपिल शर्मा, वाणी मिश्रा, हिमांशी तिवारी और आर.जे. अनादी तिवारी शामिल रहे।
खबर के पीछे का अर्थ : अगली राजनीति का केंद्र युवा, लेकिन रास्ता संस्थाओं से होकर
भारतीय पत्रकारिता महोत्सव के इस सत्र का सबसे बड़ा संदेश यह रहा कि भारतीय राजनीति में पीढ़ीगत बदलाव अब केवल भविष्य की संभावना नहीं, बल्कि वर्तमान का हिस्सा बनता जा रहा है।
जेन-जी की राजनीतिक सक्रियता का अर्थ सिर्फ सोशल मीडिया पर किसी मुद्दे को ट्रेंड कराना नहीं है। यदि यही ऊर्जा मतदान, सार्वजनिक नीति, स्थानीय निकायों, छात्र राजनीति और लोकतांत्रिक संस्थाओं में भागीदारी में बदलती है, तो इसका असर आने वाले चुनावों और राजनीतिक दलों की रणनीतियों पर पड़ सकता है।
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण सवाल भी है—क्या युवा केवल सत्ता परिवर्तन की ताकत बनेंगे या नीति परिवर्तन की ताकत भी बनेंगे?
राजनीतिक दलों के लिए आने वाला समय केवल युवाओं को अपने पक्ष में करने का नहीं, बल्कि उनके वास्तविक मुद्दों—शिक्षा, रोजगार, अवसर, पारदर्शिता, तकनीक और संस्थागत विश्वास—पर ठोस जवाब देने का होगा।
इसी तरह पत्रकारिता के सामने भी चुनौती स्पष्ट है। बदलते जनमत को केवल वायरल ट्रेंड के रूप में देखने के बजाय उसके पीछे छिपे सामाजिक और राजनीतिक कारणों को समझना होगा।
अगर युवा मतदाता मुद्दों के आधार पर निर्णय लेने लगा और पत्रकारिता ने उस बदलाव को तथ्य और जिम्मेदारी के साथ दर्ज किया, तो भारतीय राजनीति की अगली करवट केवल सत्ता बदलने की नहीं, बल्कि राजनीतिक संवाद की भाषा बदलने वाली करवट भी हो सकती है।
(SDNA)



