‘तारीख पर तारीख’ के बाद 10 साल में आया फैसला! जज ने ‘दामिनी’ का डायलॉग याद दिलाया, चरस केस में आरोपी बरी

मुजफ्फरनगर फास्ट ट्रैक कोर्ट का फैसला; जज रवि कुमार दिवाकर बोले- एक दशक तक अदालत के चक्कर काटना भी अपने आप में सजा

मुजफ्फरनगर। (सद्वार्ता) फिल्म ‘दामिनी’ का मशहूर संवाद ‘तारीख पर तारीख’ एक बार फिर अदालत की कार्यवाही के दौरान चर्चा में आ गया। मुजफ्फरनगर फास्ट ट्रैक कोर्ट नंबर-3 के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर ने करीब 10 साल पुराने एनडीपीएस मामले में फैसला सुनाते हुए आरोपी को बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि इतने लंबे समय तक मुकदमे का सामना करना और लगातार अदालत के चक्कर काटना अपने आप में एक सजा के समान है।
10 साल तक चलता रहा मुकदमा
यह मामला मुजफ्फरनगर के पटेल नगर निवासी अशोक भारती से जुड़ा है। पुलिस ने उन्हें 21 अक्टूबर 2015 को भरतिया कॉलोनी के पास गिरफ्तार किया था। पुलिस के मुताबिक, उनके कुर्ते की दाहिनी जेब से 150 ग्राम चरस बरामद हुई थी।
मामला अदालत पहुंचा और करीब एक दशक तक सुनवाई चलती रही। अंततः गुरुवार को अदालत ने अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों और प्रक्रिया की जांच के बाद आरोपी को आरोपों से बरी कर दिया।
अदालत में ‘दामिनी’ का जिक्र
फैसला सुनाते समय जज रवि कुमार दिवाकर ने हिंदी फिल्म ‘दामिनी’ के चर्चित संवाद का उल्लेख किया, जिसमें अदालतों में लगातार तारीख मिलने की स्थिति पर सवाल उठाया गया था।
जज ने कहा कि किसी व्यक्ति का वर्षों तक मुकदमे में फंसे रहना उसके मानसिक तनाव को बढ़ाता है। उनके अनुसार, 10 वर्षों तक अदालत के चक्कर काटना अपने आप में एक सजा है।
अभियोजन की कहानी में मिली कई खामियां
सुनवाई के दौरान अदालत को अभियोजन पक्ष के मामले में कई कमियां नजर आईं। बरामदगी सार्वजनिक स्थान से होने के बावजूद स्वतंत्र गवाहों को शामिल नहीं किया गया था। इसके अलावा सबूतों में विसंगतियां और एनडीपीएस एक्ट के तहत जरूरी प्रक्रियाओं का पालन नहीं किए जाने की बातें भी सामने आईं।
अदालत के सामने बरामदगी से संबंधित सैंपल की सील भी पेश नहीं की गई। वरिष्ठ अधिकारियों को दी गई जानकारी में भी कमियां पाई गईं। पुलिस के बयानों और बरामदगी मेमो में समान और दोहराव वाली भाषा का भी उल्लेख फैसले में किया गया।
2015 का केस, 2016 में चार्जशीट
अशोक भारती की गिरफ्तारी वर्ष 2015 में हुई थी, जबकि पुलिस ने 2016 में चार्जशीट दाखिल की। लंबे समय तक चली सुनवाई के बाद अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में सफल नहीं रहा। इसके बाद आरोपी को बरी कर दिया गया।
‘पार्ट-हर्ड’ मामलों पर भी टिप्पणी
जज रवि कुमार दिवाकर ने अपने फैसले में ‘पार्ट-हर्ड’ यानी जिन मामलों में सुनवाई शुरू हो चुकी है, उनके स्थानांतरण और वापस लिए जाने से जुड़े कानूनी प्रावधानों पर भी टिप्पणी की।
उन्होंने सीआरपीसी की धारा 412 और बीएनएसएस की धारा 452 का उल्लेख करते हुए कहा कि ऐसे मामलों में आदेश पारित करते समय उचित कारण दर्ज करना जरूरी है। उनके अनुसार, जिन मामलों को वापस लिया गया, उनसे संबंधित आदेशों में पर्याप्त कारण दर्ज नहीं किए गए थे।
97 मामलों का भी हुआ जिक्र
फैसले में जज ने न्यायिक और प्रशासनिक शक्तियों की सीमाओं का भी उल्लेख किया। रिपोर्ट के अनुसार, उनकी अदालत में लंबित गंभीर अपराधों से जुड़े 97 ‘पार्ट-हर्ड’ मामले 19 अगस्त को जिला एवं सत्र न्यायाधीश की अदालत में वापस लेण्यात आले होते। इसके संदर्भ में न्यायिक प्रक्रिया और प्रशासनिक अधिकारों के बीच संतुलन की आवश्यकता पर भी टिप्पणी की गई।
इस पूरे मामले में करीब एक दशक बाद आए फैसले ने लंबी न्यायिक प्रक्रिया, जांच में प्रक्रियात्मक खामियों और आरोपी के अधिकारों से जुड़े सवालों को फिर चर्चा में ला दिया है।