उज्जैन। संस्था ग़ज़लांजलि की साहित्यिक काव्य-गोष्ठी में कविता, गीत, ग़ज़ल और कहानी की विविध प्रस्तुतियों ने साहित्यप्रेमियों को भाव-विभोर कर दिया। गोष्ठी की अध्यक्षता डॉ. श्रीकृष्ण जोशी ने की।
गोष्ठी का शुभारंभ अशोक रक्ताले ने कुण्डलिया छंदों की प्रस्तुति से किया। उनकी पंक्तियाँ— “उड़-उड़ आयी फूल पर, नन्हीं तितली एक, दो पंखों को खोलकर, भर के रंग अनेक…”—ने वातावरण को काव्यमय बना दिया।
इसके बाद दिलीप जैन ने हिंदी महीनों की विशेषताओं को रेखांकित करती कविता प्रस्तुत की, जिसमें “माह बसंती, सर्द गुलाबी दिन हैं अगहन के, जेठ दुपहरी, रात पूस की, सेहरे सावन के…” जैसी पंक्तियों के माध्यम से ऋतुओं और महीनों के विविध रंगों को अभिव्यक्त किया गया।
अवधेश वर्मा नीर ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन के अवसर पर रची कविता प्रस्तुत की। वहीं सत्यनारायण सत्येंद्र ने धर्म के नाम पर अति से बचने का संदेश देती रचना “धर्म के नाम पर मत करो अति, वरना फिर जाएगी मति…” सुनाई।
शहर की यातायात व्यवस्था पर अक्षय चवरे की कविता ने भी ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने महाकाल लोक में बढ़ती भीड़ और यातायात दबाव को रेखांकित करते हुए कहा— “महाकाल लोक में यात्रियों की रेलमपेल, सड़कें छोटी पड़ गईं, हुई व्यवस्था फेल…”
कार्यक्रम को साहित्यिक ऊँचाई प्रदान करते हुए डॉ. आर.पी. तिवारी ने हिंदी दिवस के अवसर पर अपनी नवीनतम रचना प्रस्तुत की। उनकी पंक्तियाँ— “माँ भारती के हृदय का हार हिंदी है, शुचि कलेवर का सुभग शृंगार हिंदी है…”—ने हिंदी भाषा के प्रति सम्मान और गौरव की भावना को स्वर दिया।
व्ही.एस. गहलोत ‘साकित’ ने अपनी ग़ज़ल “खोने का दर्द, पाने की चाहत बनी रही, मंजिल के पास जाने की हसरत बनी रही…” प्रस्तुत की। डॉ. अखिलेश चौरे ने “चाहा था मैंने इतना तो मेरा नसीब हो, घिर जाऊँ मुश्किलों में तो कोई करीब हो…” ग़ज़ल सुनाकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया।
इस अवसर पर विनोद काबरा ने एक हृदयस्पर्शी कहानी प्रस्तुत की। कार्यक्रम के अंत में डॉ. विजय सुखवानी ने सभी उपस्थित साहित्यकारों एवं श्रोताओं के प्रति आभार व्यक्त किया।
काव्य-गोष्ठी में रचनाकारों ने अपनी विविध रचनाओं के माध्यम से कविता, ग़ज़ल, गीत और कहानी की समृद्ध साहित्यिक परंपरा को जीवंत किया। कार्यक्रम ने उज्जैन के साहित्यिक परिवेश में एक और सार्थक अध्याय जोड़ा।
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