Sunday, October 11

हनुमान अंश पर विरोध से आगे उठे सवाल, डिजिटल मनोरंजन की समान कसौटी पर हो बहस

धार्मिक भावनाओं से जुड़े विषयों पर विरोध के साथ अश्लीलता, हिंसा और आपत्तिजनक डिजिटल सामग्री के सामाजिक प्रभाव पर भी हो गंभीर चर्चा

नई दिल्ली, 24 सितंबर। (SDNA)
फिल्मों और वेब सीरीज को लेकर समाज में होने वाली बहस अब केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रह गई है। धर्म, संस्कृति, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सामाजिक मूल्यों और बच्चों पर पड़ने वाले प्रभाव जैसे मुद्दे भी इसके केंद्र में आ गए हैं। हाल में ‘हनुमान अंश’ फिल्म को लेकर सामने आए विरोध ने एक व्यापक सवाल खड़ा किया है—क्या मनोरंजन सामग्री के मूल्यांकन के लिए समाज में समान कसौटी अपनाई जा रही है?

धार्मिक या सांस्कृतिक विषयों वाली किसी फिल्म से किसी वर्ग को आपत्ति हो सकती है और लोकतांत्रिक व्यवस्था में शांतिपूर्ण विरोध तथा सार्वजनिक विमर्श उसका हिस्सा हैं। लेकिन इसी के साथ यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि अश्लीलता, अत्यधिक हिंसा, गाली-गलौज, नशे, अपराध और महिलाओं के आपत्तिजनक चित्रण वाली सामग्री के सामाजिक प्रभाव पर भी उतनी ही गंभीरता से चर्चा होती है या नहीं।

धार्मिक प्रभाव पर चिंता, तो दूसरी सामग्री के प्रभाव पर भी विचार जरूरी

किसी फिल्म के माध्यम से धार्मिक या वैचारिक विचारों के प्रभाव को लेकर अलग-अलग मत हो सकते हैं। लेकिन यदि यह स्वीकार किया जाता है कि मनोरंजन सामग्री दर्शकों की सोच को प्रभावित कर सकती है, तो यही तर्क हिंसक और अश्लील सामग्री पर भी लागू होना चाहिए।

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विशेष रूप से बच्चों और किशोरों के संदर्भ में यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है। कम उम्र में बच्चे भाषा, व्यवहार, रिश्तों और सामाजिक मानकों को समझने की प्रक्रिया में होते हैं। ऐसे में वे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर जो सामग्री देखते हैं, उससे मिलने वाले संदेशों पर अभिभावकों और समाज का ध्यान जाना स्वाभाविक है।

हालांकि किसी व्यक्ति के व्यवहार या अपराध के लिए केवल फिल्म, वेब सीरीज अथवा सोशल मीडिया सामग्री को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा। व्यक्ति के व्यवहार पर परिवार, शिक्षा, सामाजिक वातावरण, आर्थिक परिस्थितियों और व्यक्तिगत अनुभव सहित कई कारकों का प्रभाव पड़ता है। फिर भी मीडिया सामग्री के संभावित प्रभाव को पूरी तरह नकारना भी उचित नहीं माना जा सकता।

मनोरंजन की दुनिया बदली, जिम्मेदारी भी बढ़ी

कुछ दशक पहले मनोरंजन के विकल्प सीमित थे। परिवार निर्धारित समय पर टेलीविजन कार्यक्रम देखते थे और फिल्मों तक पहुंच भी अपेक्षाकृत नियंत्रित थी। डिजिटल क्रांति ने इस व्यवस्था को पूरी तरह बदल दिया है।

आज स्मार्टफोन, OTT प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया के माध्यम से मनोरंजन चौबीसों घंटे उपलब्ध है। दर्शक अपनी पसंद की सामग्री कभी भी देख सकता है। इस सुविधा ने विकल्प तो बढ़ाए हैं, लेकिन इसके साथ सामग्री की उम्र-उपयुक्तता और डिजिटल अनुशासन की चुनौती भी बढ़ी है।

सबसे अधिक ध्यान बच्चों और किशोरों की डिजिटल पहुंच पर दिया जाना आवश्यक है। मोबाइल फोन और इंटरनेट के माध्यम से उन्हें ऐसी सामग्री भी दिखाई दे सकती है, जो उनकी उम्र के लिए उपयुक्त नहीं है। इसलिए केवल अभिभावकों को जिम्मेदार ठहराना पर्याप्त नहीं है। प्लेटफॉर्म, परिवार, स्कूल और स्वयं दर्शक—सभी की भूमिका महत्वपूर्ण है।

हिंसा और अश्लीलता पर भी हो सार्वजनिक विमर्श

कई फिल्मों और वेब सीरीज में अपराध, हत्या, मारपीट, बदला, नशीले पदार्थों, अपमानजनक भाषा और यौन सामग्री को कथानक का हिस्सा बनाया जाता है। रचनात्मक स्वतंत्रता के संदर्भ में इन विषयों पर अलग-अलग दृष्टिकोण हो सकते हैं, लेकिन इनके प्रस्तुतीकरण और दर्शकों की उम्र को लेकर चर्चा आवश्यक है।

सवाल यह नहीं है कि ऐसी सामग्री को पूरी तरह समाप्त कर दिया जाए। महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि दर्शकों को उसके बारे में पर्याप्त जानकारी, आयु-आधारित वर्गीकरण और अभिभावकीय नियंत्रण के प्रभावी विकल्प उपलब्ध हैं या नहीं।

डिजिटल युग में बच्चों को केवल यह कह देना कि वे अनुचित सामग्री न देखें, व्यावहारिक समाधान नहीं है। परिवारों में संवाद, स्कूलों में डिजिटल साक्षरता और प्लेटफॉर्मों पर प्रभावी parental controls इस चुनौती से निपटने के महत्वपूर्ण माध्यम हो सकते हैं।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक जिम्मेदारी में संतुलन

लोकतंत्र में रचनात्मक अभिव्यक्ति का अपना महत्व है। किसी फिल्म या वेब सीरीज से असहमति होना अपने आप में उस सामग्री को प्रतिबंधित करने का आधार नहीं बन सकता। वहीं दूसरी ओर, हर आपत्तिजनक सामग्री को केवल ‘मनोरंजन’ कहकर नजरअंदाज करना भी पर्याप्त नहीं है।

कानून, प्रमाणित आयु-वर्गीकरण, दर्शकों की जागरूकता और डिजिटल नियंत्रण के माध्यम से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा सामाजिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता है।

विरोध की कसौटी समान क्यों न हो?

यदि किसी धार्मिक विषय वाली फिल्म को लेकर समाज का एक वर्ग अपनी आपत्ति दर्ज करता है, तो यह उसका लोकतांत्रिक अधिकार है। लेकिन समान सामाजिक संवेदनशीलता उन सामग्री के प्रति भी दिखाई जानी चाहिए, जिसमें बच्चों के लिए अनुपयुक्त भाषा, अत्यधिक हिंसा, नशे या महिलाओं के प्रति आपत्तिजनक व्यवहार को सामान्य या आकर्षक रूप में प्रस्तुत किया जाता है।

सामाजिक बहस का आधार किसी व्यक्ति, संगठन, राजनीतिक विचार या धार्मिक पहचान के बजाय सामग्री और उसके प्रभाव से जुड़े वास्तविक प्रश्न होने चाहिए। तभी बहस व्यापक और सार्थक बन सकती है।

दर्शक भी तय करता है मनोरंजन का बाजार

मनोरंजन उद्योग केवल निर्माता या प्लेटफॉर्म से संचालित नहीं होता। दर्शकों की पसंद भी बाजार की दिशा तय करती है। जिस तरह की सामग्री को अधिक देखा, साझा और लोकप्रिय किया जाता है, उसके आधार पर भविष्य में उसी प्रकार की सामग्री के निर्माण की संभावना बढ़ती है।

इसलिए जिम्मेदारी केवल सरकार, सेंसर व्यवस्था या OTT कंपनियों की नहीं है। अभिभावकों को बच्चों के साथ डिजिटल सामग्री को लेकर संवाद करना होगा। बच्चों और युवाओं को यह समझना होगा कि स्क्रीन पर दिखाई जाने वाली हर चीज वास्तविक जीवन का आदर्श नहीं होती। स्कूलों में मीडिया और डिजिटल साक्षरता को भी अधिक महत्व दिया जा सकता है।

संस्कृति की रक्षा व्यापक दृष्टिकोण से

संस्कृति और सामाजिक मूल्यों की चर्चा केवल किसी एक फिल्म के विरोध तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। यदि चिंता वास्तव में नई पीढ़ी की भाषा, सोच, व्यवहार और सामाजिक दृष्टिकोण को लेकर है, तो हर प्रकार की मनोरंजन सामग्री को समान दृष्टि से देखने की आवश्यकता है।

धार्मिक विषयों पर बनी फिल्मों की समीक्षा तथ्य और कानून के आधार पर होनी चाहिए। उसी के साथ अश्लीलता, हिंसा, नशे, अपराध और अपमानजनक भाषा वाली सामग्री के संभावित प्रभाव पर भी सार्वजनिक विमर्श होना चाहिए।

आखिर सवाल केवल ‘हनुमान अंश’ जैसी किसी एक फिल्म का नहीं है। बड़ा प्रश्न उस डिजिटल दृश्य-संस्कृति का है, जिसके बीच आज की पीढ़ी बड़ी हो रही है। समाज को तय करना होगा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान करते हुए बच्चों और युवाओं के लिए जिम्मेदार, सुरक्षित और संतुलित डिजिटल वातावरण कैसे बनाया जाए।

— डॉ. सत्यवान सौरभ
पीएचडी (राजनीति विज्ञान), कवि एवं सामाजिक विचारक