Sunday, October 11

हाइफा की ऐतिहासिक जंग: जब भारतीय घुड़सवारों ने आधुनिक हथियारों के सामने लिखी बहादुरी की मिसाल

23 सितंबर 1918 को भारतीय सैनिकों ने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान हाइफा पर कब्जे में निभाई अहम भूमिका; मेजर ठाकुर दलपत सिंह बने इस अभियान के प्रमुख सैन्य नायकों में से एक

नई दिल्ली, 24 सितंबर (SDNA):
प्रथम विश्व युद्ध के इतिहास में 23 सितंबर 1918 का दिन भारतीय सैन्य इतिहास के लिए विशेष महत्व रखता है। इसी दिन भारतीय रियासतों के घुड़सवार सैनिकों ने ऑटोमन साम्राज्य के कब्जे वाले हाइफा पर मित्र राष्ट्रों के अभियान में निर्णायक भूमिका निभाई थी। भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अनुसार, इस अभियान में जोधपुर, मैसूर और हैदराबाद लांसर्स शामिल थे।

आज का हाइफा इजरायल का प्रमुख बंदरगाह शहर है, लेकिन 1918 में यह ऑटोमन साम्राज्य के नियंत्रण में था। उस समय शहर का सैन्य और सामरिक महत्व काफी अधिक था। हाइफा पर कब्जा मित्र राष्ट्रों के लिए फिलिस्तीन और सीरिया क्षेत्र में आगे बढ़ने के अभियान का महत्वपूर्ण हिस्सा था।

15वीं इंपीरियल सर्विस कैवेलरी ब्रिगेड की भूमिका

हाइफा अभियान में भारतीय रियासतों से बनी 15वीं इंपीरियल सर्विस कैवेलरी ब्रिगेड ने हिस्सा लिया। इसमें जोधपुर, मैसूर और हैदराबाद की लांसर्स इकाइयां शामिल थीं। भारत सरकार के विदेश मंत्रालय द्वारा प्रकाशित प्रथम विश्व युद्ध संबंधी इतिहास में भी इस ब्रिगेड द्वारा हाइफा पर घुड़सवार हमला किए जाने का उल्लेख मिलता है।

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उस दौर में युद्ध तेजी से मशीनगनों और तोपखानों पर निर्भर हो रहा था। इसके बावजूद भारतीय घुड़सवार सैनिकों ने कठिन भूभाग और मजबूत दुश्मन ठिकानों के बीच हमला किया।

मेजर दलपत सिंह का नेतृत्व

इस अभियान से जुड़ा सबसे चर्चित नाम मेजर ठाकुर दलपत सिंह का है, जो जोधपुर लांसर्स के कमांडिंग अधिकारी थे। आधिकारिक सैन्य इतिहास के अनुसार, हाइफा पर हमले के दौरान दलपत सिंह मारे गए। भारत सरकार के दस्तावेजों में उन्हें हाइफा अभियान के प्रमुख सैन्य नायकों में याद किया गया है।

उनके नेतृत्व में जोधपुर लांसर्स ने शहर की ओर बढ़ते हुए दुश्मन के मजबूत प्रतिरोध का सामना किया। सैन्य अभिलेखों में दर्ज विवरण के अनुसार, लांसर्स ने शहर के भीतर प्रवेश कर कई दुश्मन सैनिकों और हथियारों को कब्जे में लिया।

तलवार और भाले बनाम मशीनगन और तोपें

हाइफा की लड़ाई की खासियत यह थी कि भारतीय घुड़सवार सैनिकों को मशीनगनों और तोपों से लैस ऑटोमन सेना के सामने घोड़े, तलवार और भाले लेकर आगे बढ़ना पड़ा।

आधुनिक हथियारों से लैस मजबूत रक्षा पंक्तियों के बावजूद घुड़सवार दस्तों ने संकरे रास्तों और कठिन भूभाग से होकर हमला किया। भारत सरकार के सैन्य इतिहास में इस अभियान को किलेबंद मोर्चों के खिलाफ घुड़सवार सेना के अंतिम प्रमुख हमलों में से एक बताया गया है।

कुछ घंटों में बदल गया युद्ध का रुख

ऐतिहासिक सैन्य विवरणों के मुताबिक, जोधपुर लांसर्स के दस्ते शहर में प्रवेश करने में सफल रहे और उनके पीछे मैसूर लांसर्स भी आगे बढ़े। एक सैन्य अभिलेख में जनरल एडमंड एलनबी के संदेश का उल्लेख है, जिसमें जोधपुर लांसर्स की कार्रवाई की सराहना की गई और लगभग 700 बंदियों को पकड़े जाने का जिक्र है।

इससे स्पष्ट होता है कि हाइफा पर कब्जे की कार्रवाई में भारतीय घुड़सवार इकाइयों की भूमिका महत्वपूर्ण थी।

दलपत सिंह को मिला ‘हीरो ऑफ हाइफा’ का सम्मान

मेजर ठाकुर दलपत सिंह युद्ध के दौरान शहीद हुए। बाद के वर्षों में उन्हें ‘हीरो ऑफ हाइफा’ के नाम से याद किया जाने लगा। भारत के आधिकारिक अभिलेख भी हाइफा की लड़ाई और दलपत सिंह के योगदान को भारतीय सैन्य इतिहास की महत्वपूर्ण घटनाओं में शामिल करते हैं।

भारत सरकार ने 2018 में हाइफा युद्ध की शताब्दी के अवसर पर वहां एक आधिकारिक समारोह भी आयोजित किया था। उस अवसर पर भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने भारतीय सैनिकों को श्रद्धांजलि दी थी।

दिल्ली में भी दर्ज है हाइफा की स्मृति

हाइफा की लड़ाई की स्मृति भारत में भी संरक्षित है। दिल्ली का तीन मूर्ति-हाइफा चौक इस सैन्य इतिहास से जुड़ा प्रमुख स्मारक है। यहां भारतीय घुड़सवार सैनिकों की स्मृति में स्थापित प्रतिमाएं इस अभियान की याद दिलाती हैं।

हाइफा की लड़ाई केवल एक सैन्य विजय का प्रसंग नहीं, बल्कि प्रथम विश्व युद्ध में भारतीय सैनिकों की व्यापक भागीदारी और बलिदान का भी हिस्सा है। प्रधानमंत्री के एक आधिकारिक संबोधन में भी हाइफा में भारतीय सैनिकों के योगदान और मेजर दलपत सिंह को ‘Hero of Haifa’ के रूप में याद किया गया है।

इतिहास का वह अध्याय जो आज भी याद किया जाता है

23 सितंबर 1918 की लड़ाई को एक सदी से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन हाइफा अभियान भारतीय सैन्य इतिहास में अब भी उल्लेखित होता है। जोधपुर, मैसूर और हैदराबाद लांसर्स के सैनिकों की भूमिका इस बात का उदाहरण है कि प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारतीय रियासतों की सेनाएं मध्य पूर्व के अभियानों में किस प्रकार शामिल हुई थीं।

मेजर दलपत सिंह और उनके साथियों की स्मृति आज भी भारत और हाइफा के बीच साझा ऐतिहासिक संबंधों के एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में दर्ज है।

(SDNA)