
विदेश मंत्री इशाक डार ने संयुक्त राष्ट्र महासचिव को पत्र भेजकर सुरक्षा परिषद से हस्तक्षेप की अपील की; भारत PCA की कार्यवाही और उसके अधिकार क्षेत्र पर जता चुका है आपत्ति
(SDNA) इस्लामाबाद। भारत-पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) को लेकर विवाद एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंच गया है। पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र से इस मामले में हस्तक्षेप की मांग करते हुए भारत से 1960 की संधि के प्रावधानों का पालन करने की अपील की है। पाकिस्तान के उपप्रधानमंत्री एवं विदेश मंत्री इशाक डार ने संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस को पत्र भेजकर सुरक्षा परिषद के सदस्य देशों से भारत पर संधि से जुड़े दायित्वों के पालन के लिए दबाव बनाने का आग्रह किया है।
संयुक्त राष्ट्र के दस्तावेजों में पाकिस्तान पहले भी सिंधु जल संधि को लेकर भारत के कदम के विरुद्ध सुरक्षा परिषद का ध्यान आकर्षित कर चुका है। अप्रैल 2026 में पाकिस्तान के स्थायी प्रतिनिधि ने सुरक्षा परिषद के अध्यक्ष को भेजे पत्र में इसी मुद्दे को ‘India-Pakistan question’ के तहत दर्ज कराने का अनुरोध किया था।
पाकिस्तान की मुख्य मांग क्या है?
इशाक डार के पत्र में पाकिस्तान ने सुरक्षा परिषद से आग्रह किया है कि भारत से सिंधु जल संधि के प्रावधानों का पालन करने को कहा जाए। पाकिस्तान का कहना है कि संधि के तहत उसके हिस्से में आने वाले जल के प्रवाह को रोकने, मोड़ने, सीमित करने या उसमें किसी तरह का हस्तक्षेप करने वाली कार्रवाई से बचा जाना चाहिए।
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पाकिस्तान ने इसके साथ ही संधि के तहत दोनों देशों के बीच सहयोग, सूचनाओं के आदान-प्रदान, परामर्श और आंकड़ों की साझेदारी जैसी प्रक्रियाओं को फिर से शुरू करने की मांग रखी है।
PCA के फैसले का भी दिया हवाला
पाकिस्तान ने अपने पत्र में Permanent Court of Arbitration (PCA) की कार्यवाही का भी उल्लेख किया है। उसका तर्क है कि सिंधु जल संधि अभी प्रभावी है और दोनों देशों पर लागू होती है।
हालांकि, इस मामले में भारत का रुख अलग रहा है। भारत ने PCA की कार्यवाही और उसके अधिकार क्षेत्र पर आपत्ति जताई है। यही वजह है कि सिंधु जल संधि को लेकर विवाद केवल पानी के बंटवारे तक सीमित नहीं है, बल्कि दोनों देशों के बीच विवाद समाधान की प्रक्रिया और संबंधित संस्थाओं के अधिकार क्षेत्र को लेकर भी मतभेद है।
सिंधु जल संधि क्या है?
भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि पर 19 सितंबर 1960 को कराची में हस्ताक्षर हुए थे। विश्व बैंक की मध्यस्थ भूमिका में हुए इस समझौते के तहत सिंधु नदी प्रणाली की छह प्रमुख नदियों के जल के इस्तेमाल को लेकर दोनों देशों के अधिकार और दायित्व निर्धारित किए गए। संयुक्त राष्ट्र की संधि संबंधी आधिकारिक जानकारी में इसे भारत, पाकिस्तान और इंटरनेशनल बैंक फॉर रिकंस्ट्रक्शन एंड डेवलपमेंट से संबंधित समझौते के रूप में दर्ज किया गया है।
संधि में विवादों के समाधान के लिए भी अलग-अलग स्तरों की व्यवस्था की गई है। इसी तंत्र को लेकर वर्तमान विवाद में दोनों देशों की व्याख्याएं अलग-अलग हैं।
पाकिस्तान ने पानी को खाद्य सुरक्षा से जोड़ा
पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र के समक्ष अपने पक्ष में कहा है कि सिंधु नदी बेसिन उसके लिए कृषि, खाद्य सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और करोड़ों लोगों की आजीविका से सीधे जुड़ा विषय है।
पाकिस्तान का कहना है कि पानी के प्रवाह में किसी भी बड़े बदलाव का असर केवल दोनों देशों के बीच कानूनी विवाद तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसके मानवीय और आर्थिक प्रभाव भी हो सकते हैं।
भारत का रुख क्या है?
भारत ने पाकिस्तान की ओर से उठाए गए इस मुद्दे पर लगातार यह रुख रखा है कि सिंधु जल संधि से संबंधित विवादों को उसके निर्धारित तंत्र और संबंधित कानूनी प्रावधानों के तहत ही देखा जाना चाहिए। भारत ने PCA की समानांतर कार्यवाही की वैधता और अधिकार क्षेत्र पर भी सवाल उठाए हैं।
संयुक्त राष्ट्र के रिकॉर्ड में पाकिस्तान द्वारा संधि को लेकर भारत के खिलाफ लगातार पत्राचार किए जाने का दस्तावेजी उल्लेख मौजूद है। दिसंबर 2025 के एक पाकिस्तानी पत्र में भी भारत द्वारा संधि को ‘abeyance’ में रखने के फैसले पर आपत्ति दर्ज की गई थी।
पानी के मुद्दे पर बढ़ा कूटनीतिक तनाव
सिंधु जल संधि को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच मतभेद अब द्विपक्षीय वार्ता से आगे अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं तक पहुंच चुके हैं। पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र के मंच से इस विषय को उठाकर अंतरराष्ट्रीय ध्यान आकर्षित करना चाहता है, जबकि भारत संबंधित अंतरराष्ट्रीय कानूनी प्रक्रिया और संस्थाओं के अधिकार क्षेत्र पर अपने अलग रुख पर कायम है।
ऐसे में सिंधु जल संधि से जुड़ा विवाद आने वाले समय में जल संसाधन, अंतरराष्ट्रीय कानून और भारत-पाकिस्तान संबंधों—तीनों स्तरों पर महत्वपूर्ण बना रह सकता है।



