
खबर और प्रचार के बीच अंतर तय करती है पत्रकार की कार्यपद्धति
SDNA विशेष लेख | नई दिल्ली
सूचना के बढ़ते विस्तार और सोशल मीडिया के प्रभाव के दौर में यह सवाल पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गया है कि पत्रकारिता और प्रचार के बीच अंतर कैसे पहचाना जाए। आज हर व्यक्ति अपनी बात सार्वजनिक मंच पर रख सकता है, समाचार के स्रोत पहले से कहीं अधिक हैं और राजनीतिक तथा वैचारिक बहसें लगातार तेज हो रही हैं। ऐसे वातावरण में पत्रकारिता की विश्वसनीयता केवल खबर देने से नहीं, बल्कि खबर की जांच-पड़ताल और उसके पीछे अपनाई गई प्रक्रिया से तय होती है।
पत्रकारिता का मूल दायित्व किसी राजनीतिक दल, सरकार या विपक्ष के पक्ष में खड़ा होना नहीं, बल्कि सार्वजनिक जीवन से जुड़े सवालों को तथ्यों के आधार पर सामने रखना है। सरकार कोई नीति लागू करती है तो उसके उद्देश्य, आर्थिक प्रभाव, संभावित लाभ और चुनौतियों पर सवाल होना चाहिए। वहीं विपक्ष किसी सरकार या नीति पर आरोप लगाता है तो उसके दावों के आधार, प्रमाण और वैकल्पिक प्रस्तावों की भी पड़ताल जरूरी है। पत्रकारिता में कसौटी व्यक्ति या राजनीतिक पहचान नहीं, बल्कि तथ्य और जनहित होना चाहिए।
सत्ता से सवाल करना विरोध नहीं
लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार से सवाल पूछना अपने आप में सरकार का विरोध नहीं माना जा सकता। सार्वजनिक संसाधनों, सरकारी नीतियों और प्रशासनिक निर्णयों से जुड़े प्रश्न नागरिकों के अधिकारों और लोकतांत्रिक जवाबदेही का हिस्सा हैं। इसी तरह विपक्ष से सवाल करना भी उसकी भूमिका को कमजोर करना नहीं, बल्कि उसके दावों और प्रस्तावों को तथ्य की कसौटी पर परखना है।
समस्या तब उत्पन्न होती है जब पत्रकार के सवालों की जगह उसकी कथित राजनीतिक निष्ठा चर्चा का विषय बन जाए। किसी सरकार से कठिन प्रश्न पूछने वाले पत्रकार को विरोधी खेमे से जोड़ देना या किसी सरकारी निर्णय के तथ्यात्मक पक्ष को सामने रखने पर उसे समर्थक मान लेना पत्रकारिता की बहस को उसके मूल विषय से दूर कर देता है।
दर्शक की पसंद भी बन रही है चुनौती
मीडिया के सामने चुनौती केवल राजनीतिक दबाव की नहीं है। समाचार उपभोक्ताओं की बदलती आदतें भी पत्रकारिता को प्रभावित कर रही हैं। सोशल मीडिया के दौर में लोग कई बार ऐसी सूचनाएं पसंद करते हैं जो उनकी पहले से बनी धारणा की पुष्टि करती हों। इसके परिणामस्वरूप मीडिया संस्थानों पर भी अपने निश्चित दर्शक या पाठक वर्ग की पसंद के अनुरूप सामग्री तैयार करने का दबाव बढ़ सकता है।
यहीं पत्रकारिता और प्रचार के बीच की रेखा धुंधली होने लगती है। प्रचार का उद्देश्य किसी व्यक्ति, विचार या व्यवस्था के समर्थन में जनमत तैयार करना हो सकता है, जबकि पत्रकारिता का मूल उद्देश्य उपलब्ध तथ्यों, प्रमाणों और संदर्भों के आधार पर नागरिकों तक सूचना पहुंचाना है।
निष्कर्ष पहले या तथ्य पहले?
पत्रकारिता की विश्वसनीयता इस बात से भी परखी जा सकती है कि खबर तैयार करते समय प्रक्रिया क्या रही। स्रोतों की पुष्टि, दस्तावेजों की जांच, दावों का सत्यापन, संदर्भों की पड़ताल और संबंधित पक्षों का पक्ष जानना जिम्मेदार पत्रकारिता के महत्वपूर्ण हिस्से हैं।
इसके विपरीत यदि निष्कर्ष पहले तय कर लिया जाए और उसके समर्थन में केवल सुविधाजनक तथ्यों को चुना जाए, तो रिपोर्टिंग और प्रचार के बीच का अंतर कम होता जाता है। किसी पत्रकार से तथ्यात्मक गलती होना संभव है, लेकिन विश्वसनीय पत्रकारिता में गलती सामने आने पर सुधार, स्पष्टीकरण और पुनः सत्यापन के लिए जगह होती है।
निष्पक्षता का अर्थ यह भी नहीं कि हर दावे को समान रूप से सही मान लिया जाए। यदि किसी तथ्य के समर्थन में पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध हैं और दूसरे दावे के समर्थन में प्रमाण कमजोर हैं, तो दोनों को कृत्रिम रूप से बराबर महत्व देना भी पत्रकारिता के उद्देश्य के अनुरूप नहीं होगा। वास्तविक संतुलन तथ्यों को उनके प्रमाण और संदर्भ के अनुरूप प्रस्तुत करने में है।
खबर का उद्देश्य नागरिक को सक्षम बनाना
पत्रकारिता का अंतिम उद्देश्य किसी राजनीतिक पक्ष को प्रसन्न या नाराज करना नहीं, बल्कि नागरिक को ऐसी विश्वसनीय जानकारी उपलब्ध कराना है जिससे वह स्वयं किसी विषय को समझ सके और अपना निष्कर्ष बना सके। सरकार के कामकाज की समीक्षा होनी चाहिए, उसकी उपलब्धियों की तथ्यात्मक रिपोर्टिंग भी होनी चाहिए। विपक्ष के आरोपों की जांच होनी चाहिए और उसके वैध प्रश्नों को भी सार्वजनिक विमर्श में स्थान मिलना चाहिए।
पत्रकारिता की स्वतंत्रता की वास्तविक परीक्षा तब होती है जब पत्रकार को अपने पसंदीदा राजनीतिक या वैचारिक पक्ष के विरुद्ध जाने वाले तथ्य भी प्रकाशित करने पड़ें। यदि सवाल केवल उस पक्ष से पूछे जाएं जिसे पत्रकार या उसका दर्शक वर्ग पसंद नहीं करता, तो पत्रकारिता की निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
पत्रकार का दायित्व सत्ता परिवर्तन नहीं
पत्रकार का काम सत्ता बनाना या गिराना नहीं है। सरकार चुनना और बदलना मतदाताओं का संवैधानिक अधिकार है। पत्रकार की भूमिका इससे अलग है। उसका दायित्व यह पूछना है कि सरकार ने क्या निर्णय लिया, क्यों लिया, उसका प्रभाव किस पर पड़ेगा, सार्वजनिक संसाधनों का इस्तेमाल कैसे हुआ और उसके परिणामों की जवाबदेही किसकी होगी।
इसी तरह विपक्ष से यह पूछना भी आवश्यक है कि उसके आरोपों का आधार क्या है, उसके प्रस्तावों को लागू करने का तरीका क्या होगा और उसके दावों के समर्थन में कौन से तथ्य उपलब्ध हैं।
पत्रकारिता की पहचान सवालों से
आज जब सूचना के अनेक माध्यम उपलब्ध हैं, पत्रकारिता की उपयोगिता केवल सूचना की गति में नहीं, बल्कि सूचना की विश्वसनीयता में है। पत्रकार सत्ता का स्थायी मित्र या स्थायी विरोधी नहीं, बल्कि सार्वजनिक जवाबदेही का माध्यम हो सकता है। उसका काम हर राजनीतिक खेमे से एक जैसे सवाल पूछना, दावों को प्रमाणों के आधार पर परखना और नागरिकों के सामने पर्याप्त संदर्भ रखना है।
पत्रकारिता की पहचान किसी एक विचारधारा या राजनीतिक खेमे के साथ खड़े होने से नहीं, बल्कि तथ्य सामने रखने और कठिन सवाल पूछने की क्षमता से बनती है। जब सवाल सत्ता और विपक्ष दोनों से होते हैं, स्रोतों की जांच होती है और निष्कर्ष पाठक पर छोड़ा जाता है, तब पत्रकारिता लोकतंत्र में अपनी सार्थक भूमिका निभाती है।
डॉ. प्रियंका सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), कवयित्री एवं सामाजिक चिंतक हैं।
