
निर्वाचन आयोग में दो आयुक्तों की कथित आपत्तियों की रिपोर्ट के बाद सियासी घमासान; आयोग ने कहा—अलग-अलग राय और टिप्पणियां संस्थागत प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा
नई दिल्ली, 23 सितंबर। (SDNA) मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर राजनीतिक विवाद बुधवार को और तेज हो गया। आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार की गिरफ्तारी, SIR प्रक्रिया को रद्द करने और हाल में हुए चुनावों को निरस्त कर दोबारा चुनाव कराने की मांग की।
केजरीवाल की यह प्रतिक्रिया द इंडियन एक्सप्रेस की उस रिपोर्ट के बाद सामने आई, जिसमें निर्वाचन आयोग के दो आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—द्वारा पिछले 10 महीनों में आयोग के कुछ निर्णयों पर कथित तौर पर कई बार आपत्ति दर्ज किए जाने का उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, दोनों आयुक्तों ने नए मतदाताओं को जोड़ने, नाम हटाने और मतदाता डेटा से संबंधित प्रक्रियाओं पर सवाल उठाए थे।
केजरीवाल ने उठाए गंभीर सवाल
केजरीवाल ने आरोप लगाया कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त अपने स्तर पर निर्वाचन आयोग का संचालन कर रहे थे और अन्य निर्वाचन आयुक्तों को निर्णय प्रक्रिया से पर्याप्त रूप से अवगत नहीं कराया गया। उन्होंने इसी आधार पर SIR की वैधता पर सवाल उठाते हुए पूरी प्रक्रिया को रद्द करने की मांग की।
उन्होंने यह भी मांग रखी कि SIR के तहत किए गए बदलावों को वापस लिया जाए और तीन वर्ष पहले की मतदाता सूची को बहाल किया जाए। इसके साथ ही उन्होंने हाल के चुनावों को रद्द कर दोबारा मतदान कराने की मांग भी रखी। द इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, केजरीवाल ने CEC ज्ञानेश कुमार की गिरफ्तारी की मांग करते हुए उनके खिलाफ देशद्रोह का मामला दर्ज करने की बात भी कही।
दो निर्वाचन आयुक्तों की आपत्तियों पर उठा विवाद
मामले का केंद्र द इंडियन एक्सप्रेस की वह जांच रिपोर्ट है, जिसमें दावा किया गया है कि निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों के दौरान कम से कम 14 मौकों पर आयोग की कुछ कार्रवाइयों पर औपचारिक आपत्तियां दर्ज कीं।
रिपोर्ट के अनुसार, आपत्तियों में नए मतदाताओं को जोड़ने की प्रक्रिया, मतदाता नाम हटाने तथा चुनावी डेटाबेस और सॉफ्टवेयर के संचालन से जुड़े मुद्दे शामिल थे। दोनों आयुक्तों ने कुछ कदमों को कथित तौर पर “अनधिकृत” और “अवैध” बताया तथा मतदाता डेटाबेस तक पहुंच को दिल्ली स्थित केंद्रीय स्तर पर केंद्रित किए जाने को लेकर भी चिंता जताई।
हालांकि, इन रिपोर्टों में सामने आए आरोप और आपत्तियां अपने आप में किसी चुनावी प्रक्रिया के अवैध होने का न्यायिक निष्कर्ष नहीं हैं। संबंधित मुद्दों पर निर्वाचन आयोग का आधिकारिक पक्ष भी महत्वपूर्ण है।
निर्वाचन आयोग ने दी अपनी सफाई
रिपोर्ट सामने आने के बाद निर्वाचन आयोग ने कहा कि उसके सभी आधिकारिक आदेश, निर्णय और प्रशासनिक निर्देश कानूनी रूप से वैध हैं। आयोग ने यह भी कहा कि किसी भी संस्थान में विचार-विमर्श के दौरान अलग-अलग राय और टिप्पणियां सामने आना सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है।
इस तरह आयोग ने आंतरिक मतभेदों को संस्थागत निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बताया और अपने आधिकारिक निर्णयों की वैधता पर जोर दिया।
SIR के दायरे को लेकर भी चर्चा
निर्वाचन आयोग की SIR प्रक्रिया मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण और पात्र मतदाताओं के रिकॉर्ड के सत्यापन से जुड़ी है। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, बिहार से शुरू हुई यह प्रक्रिया बाद में कई राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों तक विस्तारित हुई तथा 30 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की मसौदा मतदाता सूचियों में 13 करोड़ से अधिक नामों पर प्रभाव पड़ा।
इसी प्रक्रिया को लेकर विपक्षी दलों की ओर से पारदर्शिता, निर्णय प्रक्रिया और मतदाता सूची में नाम जोड़ने-हटाने के तरीकों पर सवाल उठाए जा रहे हैं। दूसरी ओर निर्वाचन आयोग अपने प्रशासनिक और चुनावी निर्णयों की वैधानिकता पर कायम है।
राजनीतिक विवाद ने पकड़ा जोर
SIR को लेकर उठे सवालों ने अब निर्वाचन आयोग की आंतरिक कार्यप्रणाली और चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता को राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है। विपक्षी दलों ने रिपोर्ट में सामने आई आपत्तियों के आधार पर जांच और कार्रवाई की मांग तेज की है।
इस पूरे विवाद में एक ओर विपक्ष की ओर से निर्वाचन आयोग के कामकाज और SIR की प्रक्रिया पर गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं, वहीं आयोग का कहना है कि अलग-अलग विचार संस्थागत deliberation का स्वाभाविक हिस्सा हैं और उसके आधिकारिक आदेश कानूनी रूप से वैध हैं। ऐसे में SIR से जुड़े विवाद और निर्वाचन आयोग की निर्णय प्रक्रिया पर आगे की राजनीतिक तथा कानूनी कार्रवाई महत्वपूर्ण रहेगी।
